अध्याय 7 · 5 / 30
7.5
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५ ॥
अपरा—अपरा; इयम्—यह; इतः—इसके अतिरिक्त; तु—किन्तु; अन्याम्—अन्य; प्रकृतिम्—शक्ति; विद्धि—समझने का प्रयत्न करो; मे—मेरी; पराम्—परा; जीव-भूताम्—जीव; महा-बाहो—हे महाबाहु; यया—जिसके द्वारा; इदम्—यह; धार्यते—उपयोग अथवा शोषण किया जा रहा है; जगत्—भौतिक जगत्।
हे महाबाहु अर्जुन, इस अपरा प्रकृति के अतिरिक्त मेरी एक परा शक्ति भी है, जो समस्त जीव हैं, जो भौतिक प्रकृति से संघर्ष करते हुए इस ब्रह्माण्ड को धारण कर रहे हैं।
यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जीव परमेश्वर की परा प्रकृति (अथवा शक्ति) के अंग हैं। अपरा शक्ति विभिन्न तत्त्वों, अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार में प्रकट पदार्थ है। भौतिक प्रकृति के दोनों रूप, अर्थात् स्थूल (पृथ्वी आदि) तथा सूक्ष्म (मन आदि), अपरा शक्ति की उपज हैं। जो जीव विभिन्न प्रयोजनों हेतु इन अपरा शक्तियों का शोषण कर रहे हैं, वे परमेश्वर की परा शक्ति हैं, और इसी शक्ति के कारण समूचा भौतिक जगत् कार्य करता है। विश्व-प्रकटीकरण में स्वयं कार्य करने की शक्ति नहीं है, जब तक उसे परा शक्ति, अर्थात् जीव, द्वारा गति न दी जाए। शक्तियाँ सदा ऊर्जावान् द्वारा नियन्त्रित होती हैं, और अतएव जीव सदा भगवान् द्वारा नियन्त्रित होते हैं—उनका कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। वे कभी भी समान रूप से शक्तिशाली नहीं हैं, जैसा अबुद्धिमान् मनुष्य सोचते हैं। जीव तथा भगवान् के बीच का भेद श्रीमद्भागवत में इस प्रकार वर्णित है (10.87.30):
aparimitā dhruvās tanubhṛto yadi sarva-gatās
tarhiṁ na śāsyateti niyamo dhruva netarathā
ajani ca yanmayaṁ tad avimucya niyantṛ
bhavet samam anujānatāṁ yad-amataṁ mata-duṣṭatayā
“हे परम नित्य! यदि देहधारी जीव आपके समान नित्य तथा सर्वव्यापक होते, तो वे आपके नियन्त्रण में न होते। किन्तु यदि जीवों को आपकी सूक्ष्म शक्तियों के रूप में स्वीकार किया जाए, तो वे तत्काल आपके परम नियन्त्रण के अधीन हो जाते हैं। अतएव वास्तविक मुक्ति में जीवों का आपके नियन्त्रण के प्रति आत्मसमर्पण निहित है, और वही समर्पण उन्हें सुखी करेगा। उसी स्वरूपगत स्थिति में ही वे नियन्ता हो सकते हैं। अतः सीमित ज्ञान वाले वे मनुष्य जो इस अद्वैतवादी सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं कि ईश्वर तथा जीव सभी दृष्टियों से समान हैं, वास्तव में स्वयं को तथा अन्यों को भ्रमित कर रहे हैं।”
परमेश्वर श्रीकृष्ण ही एकमात्र नियन्ता हैं, और समस्त जीव उनके द्वारा नियन्त्रित हैं। ये जीव उनकी परा शक्ति हैं, क्योंकि उनके अस्तित्व का गुण परम के समान ही एक है, किन्तु शक्ति की मात्रा में वे कभी भगवान् के समान नहीं हैं। स्थूल तथा सूक्ष्म अपरा शक्ति (पदार्थ) का शोषण करते हुए परा शक्ति (जीव) अपने यथार्थ आध्यात्मिक मन तथा बुद्धि को भूल जाती है। यह विस्मरण जीव पर पदार्थ के प्रभाव के कारण होता है। किन्तु जब जीव मायामयी भौतिक शक्ति के प्रभाव से मुक्त हो जाता है, तब वह मुक्ति नामक अवस्था को प्राप्त करता है। भौतिक माया के प्रभाव में मिथ्या अहंकार सोचता है, “मैं पदार्थ हूँ, और भौतिक अर्जन मेरे हैं।” उसकी वास्तविक स्थिति तब अनुभूत होती है जब वह समस्त भौतिक धारणाओं से मुक्त हो जाता है, जिनमें यह धारणा भी सम्मिलित है कि वह सभी दृष्टियों से ईश्वर के साथ एक हो जाएगा। अतएव मनुष्य यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि गीता इस तथ्य की पुष्टि करती है कि जीव श्रीकृष्ण की अनेक शक्तियों में से केवल एक है; और जब यह शक्ति भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाती है, तब वह पूर्ण रूप से कृष्णभावनाभावित, अर्थात् मुक्त हो जाती है।