अध्याय 7 · 8 / 30
7.8
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८ ॥
रसः—स्वाद; अहम्—मैं; अप्सु—जल में; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; प्रभा अस्मि—मैं प्रकाश हूँ; शशि-सूर्ययोः—सूर्य तथा चन्द्रमा में; प्रणवः—तीन अक्षर अ.उ.म्; सर्व—समस्त; वेदेषु—वेदों में; शब्दः—ध्वनि-कम्पन; खे—आकाश में; पौरुषम्—सामर्थ्य; नृषु—मनुष्य में।
हे कुन्तीपुत्र [अर्जुन], मैं जल का स्वाद हूँ, मैं सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूँ, मैं वैदिक मन्त्रों में ॐ अक्षर हूँ; मैं आकाश में ध्वनि तथा मनुष्य में सामर्थ्य हूँ।
यह श्लोक यह समझाता है कि किस प्रकार भगवान् अपनी विविध भौतिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों द्वारा सर्वव्यापक हैं। परमेश्वर को प्रारम्भ में उनकी विभिन्न शक्तियों द्वारा अनुभव किया जा सकता है, और इस प्रकार वे निराकार रूप में अनुभूत होते हैं। जिस प्रकार सूर्य में स्थित देवता एक पुरुष हैं और अपनी सर्वव्यापक शक्ति, सूर्य-प्रकाश, द्वारा अनुभूत होते हैं, उसी प्रकार भगवान्, यद्यपि अपने नित्य धाम में स्थित हैं, अपनी सर्वव्यापक, विसरित शक्तियों द्वारा अनुभूत होते हैं। जल का स्वाद जल का सक्रिय सिद्धान्त है। कोई भी समुद्र का जल पीना पसन्द नहीं करता, क्योंकि जल का शुद्ध स्वाद लवण से मिश्रित होता है। जल के प्रति आकर्षण स्वाद की शुद्धता पर निर्भर करता है, और यह शुद्ध स्वाद भगवान् की शक्तियों में से एक है। निर्विशेषवादी जल में उसके स्वाद द्वारा भगवान् की उपस्थिति को अनुभव करता है, और साकारवादी भी मनुष्य की प्यास बुझाने हेतु जल की कृपापूर्ण आपूर्ति के लिए भगवान् का गुणगान करता है। परम का अनुभव करने की यही रीति है। व्यावहारिक रूप से कहें तो साकारवाद तथा निराकारवाद में कोई विरोध नहीं है। जो ईश्वर को जानता है, वह जानता है कि निराकार धारणा तथा साकार धारणा प्रत्येक वस्तु में एक साथ विद्यमान हैं और इसमें कोई विरोध नहीं है। अतएव भगवान् चैतन्य ने अपने उदात्त सिद्धान्त की स्थापना की: अचिन्त्य-भेद तथा अभेद-तत्त्वम्—एक साथ एक तथा भिन्न।
सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश भी मूलतः ब्रह्मज्योति से ही निकलता है, जो भगवान् का निराकार तेज है। इसी प्रकार प्रणव अथवा ॐकार, वह दिव्य ध्वनि जो प्रत्येक वैदिक स्तोत्र के आरम्भ में परमेश्वर को सम्बोधित करने हेतु प्रयुक्त होती है, भी उन्हीं से निकलती है। चूँकि निर्विशेषवादी परमेश्वर श्रीकृष्ण को उनके असंख्य नामों से सम्बोधित करने में अत्यन्त भयभीत रहते हैं, अतः वे दिव्य ध्वनि ॐकार का उच्चारण करना पसन्द करते हैं। किन्तु उन्हें यह बोध नहीं होता कि ॐकार श्रीकृष्ण का ध्वनि-स्वरूप है। कृष्णभावनामृत का अधिकार-क्षेत्र सर्वत्र विस्तृत है, और जो कृष्णभावनामृत को जानता है, वह धन्य है। जो श्रीकृष्ण को नहीं जानते वे माया में हैं, और इस प्रकार श्रीकृष्ण का ज्ञान मुक्ति है, तथा उनका अज्ञान बन्धन है।