हि

अध्याय 7 · 9 / 30

7.9

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥

पुण्यः—मूल; गन्धः—सुगन्ध; पृथिव्याम्—पृथ्वी में; च—भी; तेजः—ताप; च—भी; अस्मि—मैं हूँ; विभावसौ—अग्नि में; जीवनम्—जीवन; सर्व—समस्त; भूतेषु—जीवों में; तपः—तप; च—भी; अस्मि—मैं हूँ; तपस्विषु—तप करने वालों में।

मैं पृथ्वी की मूल सुगन्ध हूँ, और मैं अग्नि का ताप हूँ। मैं समस्त जीवित प्राणियों का जीवन हूँ, और मैं समस्त तपस्वियों की तपस्या हूँ।

पुण्य का अर्थ है वह जो विकृत नहीं होता; पुण्य मूल है। भौतिक जगत् में प्रत्येक वस्तु में कोई न कोई स्वाद अथवा सुगन्ध होती है, जैसे पुष्प में, अथवा पृथ्वी में, जल में, अग्नि में, वायु में, इत्यादि की सुगन्ध। वह निर्मल स्वाद, वह मूल स्वाद, जो प्रत्येक वस्तु में व्याप्त है, श्रीकृष्ण है। इसी प्रकार, प्रत्येक वस्तु का एक विशिष्ट मूल स्वाद होता है, और यह स्वाद रसायनों के मिश्रण से बदला जा सकता है। अतः प्रत्येक मूल वस्तु में कोई गन्ध, कोई सुगन्ध, तथा कोई स्वाद होता है। विभाव का अर्थ है अग्नि। अग्नि के बिना हम कारखाने नहीं चला सकते, हम भोजन नहीं पका सकते, इत्यादि, और वह अग्नि श्रीकृष्ण है। अग्नि का ताप श्रीकृष्ण है। वैदिक चिकित्सा के अनुसार, अपच उदर में न्यून ताप के कारण होता है। अतः पाचन के लिए भी अग्नि की आवश्यकता है। कृष्णभावनामृत में हमें यह बोध होता है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा प्रत्येक सक्रिय सिद्धान्त, समस्त रसायन तथा समस्त भौतिक तत्त्व श्रीकृष्ण के कारण हैं। मनुष्य के जीवन की अवधि भी श्रीकृष्ण के कारण है। अतएव श्रीकृष्ण की कृपा से मनुष्य अपने जीवन को बढ़ा अथवा घटा सकता है। अतः कृष्णभावनामृत प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय है।