अध्याय 8 · 21 / 28
8.21
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥२१॥
अव्यक्तः—अव्यक्त; अक्षरः—अविनाशी; इति—इस प्रकार; उक्तः—कहा गया; तम्—जो; आहुः—जाना जाता है; परमाम्—परम; गतिम्—गन्तव्य; यम्—जिसे; प्राप्य—प्राप्त करके; न—कभी नहीं; निवर्तन्ते—लौटते हैं; तत्-धाम—वह धाम; परमम्—परम; मम—मेरा।
वह परम धाम अव्यक्त तथा अविनाशी कहलाता है, और वही परम गन्तव्य है। जब मनुष्य वहाँ जाता है, तब वह कभी नहीं लौटता। वही मेरा परम धाम है।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के परम धाम का वर्णन ब्रह्म-संहिता में चिन्तामणि-धाम के रूप में हुआ है, जो ऐसा स्थान है जहाँ समस्त इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का परम धाम, जो गोलोक वृन्दावन के नाम से विख्यात है, स्पर्शमणि से निर्मित प्रासादों से परिपूर्ण है। वहाँ ऐसे वृक्ष भी हैं, जिन्हें “कल्पवृक्ष” कहा जाता है, जो माँगने पर किसी भी प्रकार का भोज्य पदार्थ प्रदान करते हैं, और वहाँ सुरभि नामक गौएँ हैं, जो दुग्ध की असीम आपूर्ति करती हैं। इस धाम में भगवान् की सेवा सहस्रों लक्ष्मियों (भाग्य की देवियों) द्वारा होती है, और वे गोविन्द कहलाते हैं, जो आदि भगवान् तथा समस्त कारणों के कारण हैं। भगवान् को अपनी वंशी बजाने का अभ्यास है (वेणुं क्वणन्तम्)। उनका दिव्य रूप समस्त लोकों में सर्वाधिक आकर्षक है—उनके नेत्र कमल की पंखुड़ियों के समान हैं और उनके शरीर का वर्ण मेघों के समान है। वे इतने आकर्षक हैं कि उनका सौन्दर्य सहस्रों कामदेवों के सौन्दर्य से बढ़कर है। वे केसरिया वस्त्र धारण करते हैं, अपने गले में माला तथा अपने केशों में मोरपंख धारण करते हैं। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण अपने व्यक्तिगत धाम (गोलोक वृन्दावन) का, जो आध्यात्मिक राज्य का सर्वोच्च लोक है, केवल एक संक्षिप्त संकेत देते हैं। एक सजीव वर्णन ब्रह्म-संहिता में दिया गया है। वैदिक साहित्य कहता है कि परम भगवान् के धाम से बढ़कर कुछ भी नहीं है, और वह धाम ही परम गन्तव्य है। जब मनुष्य उसे प्राप्त कर लेता है, तब वह कभी भौतिक जगत् में नहीं लौटता। कृष्ण का परम धाम तथा स्वयं कृष्ण अभिन्न हैं, क्योंकि वे एक ही गुण के हैं। इस पृथ्वी पर, दिल्ली से नब्बे मील दक्षिण-पूर्व में स्थित वृन्दावन, आध्यात्मिक आकाश में स्थित उस परम गोलोक वृन्दावन का प्रतिरूप है। जब कृष्ण इस पृथ्वी पर अवतरित हुए, तब उन्होंने भारत के मथुरा जनपद में वृन्दावन नामक उसी विशेष भूखण्ड पर अपनी लीलाएँ कीं।