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अध्याय 1 · 33 / 39

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अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥ ४० ॥

adharma—अधर्म; abhibhavāt—प्रबल हो जाने से; kṛṣṇa—हे श्रीकृष्ण; praduṣyanti—दूषित हो जाती हैं; kula-striyaḥ—कुल की स्त्रियाँ; strīṣu—स्त्रीत्व के; duṣṭāsu—इस प्रकार दूषित होने पर; vārṣṇeya—हे वृष्णिवंशी; jāyate—उत्पन्न होती है; varṇa-saṅkaraḥ—अवांछित सन्तति।

हे श्रीकृष्ण, जब कुल में अधर्म प्रबल हो जाता है, तब कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, और हे वृष्णिवंशी, स्त्रीत्व के पतन से अवांछित सन्तति उत्पन्न होती है।

मानव समाज में उत्तम जनसंख्या जीवन में शान्ति, समृद्धि तथा आध्यात्मिक प्रगति का मूल सिद्धान्त है। वर्णाश्रम धर्म के सिद्धान्त इस प्रकार बनाए गए थे कि राज्य तथा समुदाय की सामान्य आध्यात्मिक प्रगति के लिए समाज में उत्तम जनसंख्या प्रबल रहे। ऐसी जनसंख्या उसके स्त्रीत्व की पवित्रता तथा सतीत्व पर निर्भर करती है। जिस प्रकार बालक सरलता से बहकाए जाने की प्रवृत्ति रखते हैं, उसी प्रकार स्त्रियाँ भी पतन की प्रवृत्ति रखती हैं। अतएव बालकों तथा स्त्रियों दोनों को कुल के वृद्धजनों से संरक्षण की आवश्यकता होती है। विविध धार्मिक कार्यों में संलग्न रहने से स्त्रियाँ व्यभिचार की ओर नहीं बहकेंगी। चाणक्य पण्डित के अनुसार स्त्रियाँ सामान्यतः अधिक बुद्धिमती नहीं होतीं, अतएव विश्वसनीय नहीं होतीं। अतः धार्मिक क्रियाओं की भिन्न-भिन्न कुल-परम्पराओं को उन्हें सदा संलग्न रखना चाहिए, जिससे उनकी पवित्रता तथा निष्ठा वर्णाश्रम पद्धति में भाग लेने योग्य उत्तम जनसंख्या को जन्म देगी। ऐसे वर्णाश्रम-धर्म के विफल होने पर स्त्रियाँ स्वभावतः स्वच्छन्द होकर पुरुषों से मेल-जोल करने लगती हैं, और इस प्रकार अवांछित जनसंख्या के संकट से व्यभिचार में लिप्त होता है। उत्तरदायित्वहीन पुरुष भी समाज में व्यभिचार को उकसाते हैं, और इस प्रकार अवांछित बालक मानव जाति में युद्ध तथा महामारी के संकट के साथ बाढ़ की भाँति भर जाते हैं।