हि

अध्याय 1 · 32 / 39

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कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ ३९ ॥

kula-kṣaye—कुल के विनाश में; praṇaśyanti—नष्ट हो जाती हैं; kula-dharmāḥ—कुल की परम्पराएँ; sanātanāḥ—नित्य; dharme—धर्म के; naṣṭe—नष्ट होने पर; kulam—कुल; kṛtsnam—समस्त; adharmaḥ—अधर्म; abhibhavati—बदल देता है; uta—कहा जाता है।

वंश के विनाश से नित्य कुल-परम्परा नष्ट हो जाती है, और इस प्रकार शेष कुल अधर्म में लिप्त हो जाता है।

वर्णाश्रम संस्था की व्यवस्था में धार्मिक परम्पराओं के अनेक सिद्धान्त हैं जो परिवार के सदस्यों को समुचित रूप से विकसित होने तथा आध्यात्मिक मूल्यों को प्राप्त करने में सहायता करते हैं। ऐसी शुद्धिकारक प्रक्रियाओं का उत्तरदायित्व कुल के वृद्धजनों पर होता है, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक चलती हैं। किन्तु वृद्धजनों की मृत्यु पर शुद्धिकरण की ऐसी कुल-परम्पराएँ रुक सकती हैं, और शेष युवा सदस्य अधार्मिक आदतें विकसित कर सकते हैं, जिससे वे आध्यात्मिक मुक्ति का अपना अवसर खो बैठते हैं। अतएव किसी भी प्रयोजन से कुल के वृद्धजनों का वध नहीं करना चाहिए।