हि

अध्याय 1 · 35 / 39

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दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४२ ॥

doṣaiḥ—ऐसे दोषों से; etaiḥ—इन सबसे; kula-ghnānām—कुल के संहारकों के; varṇa-saṅkara—अवांछित सन्तानें; kārakaiḥ—करने वालों से; utsādyante—विनष्ट हो जाते हैं; jāti-dharmāḥ—समुदाय की परियोजना; kula-dharmāḥ—कुल-परम्परा; ca—भी; śāśvatāḥ—नित्य।

कुल-परम्परा के विनाशकों के दुष्कर्मों के कारण सभी प्रकार की सामुदायिक परियोजनाएँ तथा कुल-कल्याण की क्रियाएँ विनष्ट हो जाती हैं।

मानव समाज के चार वर्ण, कुल-कल्याण की क्रियाओं सहित, जैसा कि सनातन-धर्म अथवा वर्णाश्रम-धर्म की संस्था द्वारा निर्धारित हैं, इस प्रकार रचे गए हैं कि मनुष्य को अपनी परम मुक्ति प्राप्त करने में समर्थ बनाएँ। अतएव समाज के उत्तरदायित्वहीन नेताओं द्वारा सनातन-धर्म की परम्परा का भंग उस समाज में अव्यवस्था ला देता है, और परिणामस्वरूप लोग जीवन का लक्ष्य—विष्णु—भूल जाते हैं। ऐसे नेता अन्धे कहलाते हैं, और जो व्यक्ति ऐसे नेताओं का अनुसरण करते हैं वे निश्चय ही अव्यवस्था में जा पड़ते हैं।