हि

अध्याय 1 · 36 / 39

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उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ४३ ॥

utsanna—नष्ट; kula-dharmāṇām—कुल-परम्पराओं वालों के; manuṣyāṇām—ऐसे मनुष्यों का; janārdana—हे श्रीकृष्ण; narake—नरक में; niyatam—सदा; vāsaḥ—निवास; bhavati—होता है; iti—इस प्रकार; anuśuśruma—मैंने गुरु-परम्परा से सुना है।

हे श्रीकृष्ण, हे जनों के पालक, मैंने गुरु-परम्परा से सुना है कि जो कुल-परम्पराओं का विनाश करते हैं, वे सदा नरक में निवास करते हैं।

अर्जुन अपना तर्क अपने व्यक्तिगत अनुभव पर नहीं, अपितु अधिकारी पुरुषों से सुने हुए ज्ञान पर आधारित करता है। वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने की यही रीति है। उस ज्ञान में पहले से स्थित किसी उपयुक्त व्यक्ति की सहायता के बिना मनुष्य तथ्यात्मक ज्ञान के वास्तविक बिन्दु तक नहीं पहुँच सकता। वर्णाश्रम संस्था में एक व्यवस्था है जिसके अनुसार मनुष्य को मृत्यु से पूर्व अपने पापमय कर्मों के लिए प्रायश्चित्त की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है। जो सदा पापमय कर्मों में संलग्न रहता है, उसे प्रायश्चित्त नामक शुद्धिकरण की प्रक्रिया का उपयोग करना चाहिए। ऐसा किए बिना मनुष्य निश्चय ही पापमय कर्मों के परिणामस्वरूप दुःखमय जीवन भोगने के लिए नारकीय लोकों में भेजा जाएगा।