अध्याय 10 · 1 / 40
10.1
श्रीभगवानुवाच
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥
श्री-भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; भूयः—पुनः; एव—निश्चय ही; महा-बाहो—हे महाबाहु; शृणु—सुनो; मे—मेरा; परमम्—परम; वचः—वचन; यत्—जो; ते—तुम्हें; अहम्—मैं; प्रीयमाणाय—तुम्हें अपना प्रिय मानते हुए; वक्ष्यामि—कहूँगा; हित-काम्यया—तुम्हारे हित हेतु।
श्रीभगवान् ने कहा: हे प्रिय मित्र महाबाहु अर्जुन! मेरे परम वचन को पुनः सुनो, जिसे मैं तुम्हारे हित हेतु तुम्हें प्रदान करूँगा और जो तुम्हें परम आनन्द देगा।
परमम् शब्द की व्याख्या पराशर मुनि इस प्रकार करते हैं: जो छह ऐश्वर्यों से परिपूर्ण है, जिसमें पूर्ण बल, पूर्ण यश, सम्पत्ति, ज्ञान, सौन्दर्य तथा वैराग्य विद्यमान हैं, वही परमम् अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् है। जब श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर विद्यमान थे, तब उन्होंने इन छहों ऐश्वर्यों को प्रकट किया। अतः पराशर मुनि जैसे महान् ऋषियों ने श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् रूप में स्वीकार किया है। अब श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने ऐश्वर्यों तथा अपने कार्यों के विषय में और अधिक गोपनीय ज्ञान का उपदेश दे रहे हैं। इससे पूर्व, सातवें अध्याय से आरम्भ करके, भगवान् अपनी विभिन्न ऊर्जाओं तथा उनके क्रियाशील होने की रीति को पहले ही समझा चुके हैं। अब इस अध्याय में वे अर्जुन को अपने विशिष्ट ऐश्वर्यों का निरूपण करते हैं। पूर्व अध्याय में उन्होंने भक्ति को दृढ़ विश्वास में स्थापित करने हेतु अपनी विभिन्न ऊर्जाओं का स्पष्ट निरूपण किया है। इस अध्याय में पुनः वे अर्जुन को अपने प्राकट्यों तथा विविध ऐश्वर्यों के विषय में बताते हैं।
ज्यों-ज्यों मनुष्य परमेश्वर के विषय में अधिकाधिक श्रवण करता है, त्यों-त्यों वह भक्ति में और अधिक स्थिर होता जाता है। मनुष्य को सदा भक्तगण की संगति में भगवान् के विषय में श्रवण करना चाहिए; इससे उसकी भक्ति में अभिवृद्धि होगी। भक्त-समाज में ऐसे संवाद केवल उन्हीं के मध्य हो सकते हैं जो वस्तुतः कृष्णभावनामृत में रहने के लिए उत्सुक हैं। अन्य लोग ऐसे संवादों में भाग नहीं ले सकते। भगवान् अर्जुन को स्पष्ट रूप से बताते हैं कि चूँकि वह उन्हें अत्यन्त प्रिय है, अतः उसके हित हेतु ही ऐसे संवाद हो रहे हैं।