हि

अध्याय 10 · 2 / 40

10.2

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥

न—कभी नहीं; मे—मेरा; विदुः—जानते हैं; सुर-गणाः—देवतागण; प्रभवम्—ऐश्वर्य; न—कभी नहीं; महर्षयः—महान् ऋषिगण; अहम्—मैं हूँ; आदिः—उद्गम; हि—निश्चय ही; देवानाम्—देवताओं का; महर्षीणाम्—महान् ऋषियों का; च—भी; सर्वशः—सब प्रकार से।

न तो देवताओं के समूह और न ही महान् ऋषिगण मेरे उद्गम को जानते हैं, क्योंकि सब प्रकार से मैं ही देवताओं तथा ऋषियों का स्रोत हूँ।

जैसा कि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, भगवान् श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं। उनसे बढ़कर कोई नहीं है; वे समस्त कारणों के कारण हैं। यहाँ भगवान् स्वयं भी यह कहते हैं कि वे समस्त देवताओं तथा ऋषियों के कारण हैं। देवता तथा महान् ऋषि भी श्रीकृष्ण को नहीं समझ सकते; वे न तो उनके नाम को और न उनके स्वरूप को जान सकते हैं, तो फिर इस क्षुद्र ग्रह के तथाकथित विद्वानों की क्या स्थिति है? कोई नहीं समझ सकता कि यह परमेश्वर एक साधारण मनुष्य रूप में पृथ्वी पर क्यों अवतरित होते हैं और ऐसे सामान्य प्रतीत होने वाले किन्तु अद्भुत कार्य क्यों सम्पन्न करते हैं। अतः मनुष्य को यह जानना चाहिए कि श्रीकृष्ण को समझने हेतु विद्वत्ता आवश्यक योग्यता नहीं है। देवताओं तथा महान् ऋषियों ने भी अपनी मानसिक कल्पना द्वारा श्रीकृष्ण को समझने का प्रयत्न किया है, और वे ऐसा करने में असफल रहे हैं। श्रीमद्भागवत में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि महान् देवता भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को नहीं समझ पाते। वे अपनी अपूर्ण इन्द्रियों की सीमा तक कल्पना कर सकते हैं और निराकारवाद का विपरीत निष्कर्ष—अर्थात् भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से अप्रकट किसी वस्तु का—पा सकते हैं, अथवा वे मानसिक कल्पना से कुछ कल्पित कर सकते हैं, किन्तु ऐसी मूर्खतापूर्ण कल्पना से श्रीकृष्ण को समझना सम्भव नहीं है।

यहाँ भगवान् परोक्ष रूप से कहते हैं कि यदि कोई परम सत्य को जानना चाहता है, तो “यहाँ मैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् रूप में विद्यमान हूँ। मैं ही परमेश्वर हूँ।” मनुष्य को यह जानना चाहिए। यद्यपि कोई उन अचिन्त्य भगवान् को नहीं समझ सकता जो स्वयं विद्यमान हैं, तथापि वे विद्यमान हैं। हम भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत में उनके वचनों का अध्ययन मात्र करके श्रीकृष्ण को, जो नित्य, आनन्द तथा ज्ञान से परिपूर्ण हैं, वस्तुतः समझ सकते हैं। निराकार ब्रह्म की धारणा वे व्यक्ति कर सकते हैं जो पहले से ही भगवान् की अपरा ऊर्जा में स्थित हैं, किन्तु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की धारणा तब तक नहीं की जा सकती जब तक मनुष्य दिव्य स्थिति में न हो।

चूँकि अधिकांश मनुष्य श्रीकृष्ण को उनकी वास्तविक स्थिति में नहीं समझ सकते, अतः अपनी अहैतुकी कृपावश वे ऐसे कल्पनावादियों पर अनुग्रह दर्शाने हेतु अवतरित होते हैं। फिर भी परमेश्वर के असाधारण कार्यों के होते हुए भी, भौतिक ऊर्जा में कल्मष के कारण, ये कल्पनावादी अब भी यही सोचते हैं कि निराकार ब्रह्म ही परम है। केवल वे भक्त जो परमेश्वर के प्रति पूर्णतः शरणागत हैं, पूर्ण पुरुषोत्तम की कृपा से यह समझ सकते हैं कि वे श्रीकृष्ण हैं। भगवान् के भक्तगण ईश्वर की निराकार ब्रह्म धारणा की चिन्ता नहीं करते; उनकी श्रद्धा तथा भक्ति उन्हें तत्काल परमेश्वर के प्रति शरणागत करा देती है, और श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा से वे श्रीकृष्ण को समझ सकते हैं। अन्य कोई उन्हें नहीं समझ सकता। अतः महान् ऋषि भी सहमत हैं: आत्मा क्या है, परम क्या है? वही हैं जिनकी हमें आराधना करनी है।