हि

अध्याय 10 · 10 / 40

10.11

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥

तेषाम्—उनके लिए; एव—निश्चय ही; अनुकम्पा-अर्थम्—विशेष कृपा दर्शाने हेतु; अहम्—मैं; अज्ञान-जम्—अज्ञान के कारण; तमः—अन्धकार; नाशयामि—दूर करता हूँ; आत्म—भीतर; भाव-स्थः—उनके भीतर स्थित; ज्ञान—ज्ञान का; दीपेन—दीपक से; भास्वता—प्रकाशमान।

उन पर करुणावश, मैं उनके हृदयों में निवास करते हुए, ज्ञान के देदीप्यमान दीपक से अज्ञानजनित अन्धकार का नाश करता हूँ।

जब भगवान् चैतन्य काशी में हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे के कीर्तन का प्रचार कर रहे थे, तब सहस्रों लोग उनका अनुगमन कर रहे थे। प्रकाशानन्द, जो उस समय काशी में एक अत्यन्त प्रभावशाली तथा विद्वान् पण्डित थे, भगवान् चैतन्य का भावुक होने के कारण उपहास करते थे। कभी-कभी दार्शनिक भक्तों की आलोचना करते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि अधिकांश भक्त अज्ञान के अन्धकार में हैं और दार्शनिक दृष्टि से भोले भावुक हैं। वस्तुतः यह तथ्य नहीं है। ऐसे अत्यन्त विद्वान् पण्डित हुए हैं जिन्होंने भक्ति के दर्शन को प्रस्तुत किया है, किन्तु यदि कोई भक्त उनके साहित्य का अथवा अपने आध्यात्मिक गुरु का लाभ न भी उठाए, तो भी यदि वह अपनी भक्ति में निष्कपट है, तो श्रीकृष्ण स्वयं उसके हृदय के भीतर से उसकी सहायता करते हैं। अतः कृष्णभावनामृत में संलग्न निष्कपट भक्त ज्ञान से रहित नहीं हो सकता। एकमात्र योग्यता यह है कि मनुष्य पूर्ण कृष्णभावनामृत में भक्ति का सम्पादन करे।

आधुनिक दार्शनिक सोचते हैं कि विवेक के बिना मनुष्य शुद्ध ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। उनके लिए परमेश्वर यह उत्तर देते हैं: जो शुद्ध भक्ति में संलग्न हैं, यद्यपि वे पर्याप्त शिक्षा से रहित हों और वैदिक सिद्धान्तों के पर्याप्त ज्ञान से भी रहित हों, तो भी परमेश्वर द्वारा उनकी सहायता की जाती है, जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है।

भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि मूलतः परम सत्य, परब्रह्म, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को केवल कल्पना द्वारा समझने की कोई सम्भावना नहीं है, क्योंकि परम सत्य इतने महान् हैं कि केवल मानसिक प्रयास से उन्हें समझना अथवा प्राप्त करना सम्भव नहीं है। मनुष्य कई लाख वर्षों तक कल्पना करता रह सकता है, और यदि वह भक्त नहीं है, यदि वह परम सत्य का प्रेमी नहीं है, तो वह श्रीकृष्ण अथवा परम सत्य को कभी नहीं समझ सकेगा। केवल भक्ति के द्वारा ही परम सत्य श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं, और अपनी अचिन्त्य ऊर्जा से वे स्वयं को शुद्ध भक्त के हृदय में प्रकट कर सकते हैं। शुद्ध भक्त के हृदय में सदा श्रीकृष्ण रहते हैं; अतः वह ठीक उस सूर्य के समान है जो अज्ञान के अन्धकार को विलीन कर देता है। यह श्रीकृष्ण द्वारा शुद्ध भक्त पर की गई विशेष कृपा है।

भौतिक संगति के कल्मष के कारण, अनेक-अनेक लाख जन्मों तक, मनुष्य का हृदय सदा भौतिकता की धूल से ढका रहता है; किन्तु जब मनुष्य भक्ति में संलग्न होता है और निरन्तर हरे कृष्ण का कीर्तन करता है, तब वह धूल शीघ्र ही हट जाती है, और मनुष्य शुद्ध ज्ञान के स्तर तक उन्नत हो जाता है। विष्णु का अन्तिम लक्ष्य केवल इसी कीर्तन तथा भक्ति से प्राप्त किया जा सकता है, मानसिक कल्पना अथवा तर्क से नहीं। शुद्ध भक्त को जीवन की आवश्यकताओं की चिन्ता नहीं करनी पड़ती; उसे चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जब वह अपने हृदय से अन्धकार हटा देता है, तब सब कुछ परमेश्वर द्वारा स्वतः ही प्रदान कर दिया जाता है, क्योंकि वे भक्त की प्रेमाभक्ति से प्रसन्न होते हैं। यही गीता की शिक्षाओं का सार है। भगवद्गीता का अध्ययन करके मनुष्य परमेश्वर के प्रति पूर्णतः शरणागत आत्मा बन सकता है और स्वयं को शुद्ध भक्ति में संलग्न कर सकता है। ज्यों ही भगवान् भार सँभाल लेते हैं, त्यों ही मनुष्य सभी प्रकार के भौतिकतावादी प्रयासों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है।