अध्याय 10 · 11 / 40
10.12-13
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; परम्—परम; ब्रह्म—सत्य; परम्—परम; धाम—आश्रय; पवित्रम्—परम पवित्र; परमम्—परम; भवान्—आप; पुरुषम्—पुरुष; शाश्वतम्—आदि; दिव्यम्—दिव्य; आदि-देवम्—आदि भगवान्; अजम्—अजन्मा; विभुम्—महानतम; आहुः—कहते हैं; त्वाम्—आपको; ऋषयः—ऋषिगण; सर्वे—समस्त; देवर्षिः—देवताओं में ऋषि; नारदः—नारद; तथा—भी; असितः—असित; देवलः—देवल; व्यासः—व्यास; स्वयम्—स्वयं; च—भी; एव—निश्चय ही; ब्रवीषि—समझा रहे हैं; मे—मुझे।
अर्जुन ने कहा: आप परब्रह्म, परम, परम आश्रय तथा परम पवित्रकर्ता, परम सत्य तथा नित्य दिव्य पुरुष हैं। आप आदि भगवान्, दिव्य तथा आदि हैं, और आप अजन्मा तथा सर्वव्यापी सौन्दर्य हैं। नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे समस्त महान् ऋषि आपके विषय में यही उद्घोषित करते हैं, और अब आप स्वयं मुझसे यह घोषित कर रहे हैं।
इन दो श्लोकों में परमेश्वर आधुनिक दार्शनिक को एक अवसर प्रदान करते हैं, क्योंकि यहाँ स्पष्ट है कि परम जीवात्मा से भिन्न हैं। अर्जुन, इस अध्याय में भगवद्गीता के सारभूत चार श्लोकों को सुनने के पश्चात्, समस्त सन्देहों से पूर्णतः मुक्त हो गया और उसने श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् रूप में स्वीकार कर लिया। वह तत्काल निर्भीकतापूर्वक उद्घोषित करता है, “आप परब्रह्म, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।” और इससे पूर्व श्रीकृष्ण यह कह चुके हैं कि वे प्रत्येक वस्तु तथा प्रत्येक जीव के उद्गमकर्ता हैं। प्रत्येक देवता तथा प्रत्येक मनुष्य उन पर ही आश्रित है। मनुष्य तथा देवता, अज्ञानवश, सोचते हैं कि वे परम हैं तथा परमेश्वर श्रीकृष्ण से स्वतन्त्र हैं। वह अज्ञान भक्ति के सम्पादन से पूर्णतः दूर हो जाता है। इसकी व्याख्या पूर्व श्लोक में भगवान् पहले ही कर चुके हैं। अब उनकी कृपा से अर्जुन उन्हें परम सत्य रूप में, वैदिक विधान के अनुरूप, स्वीकार कर रहा है। ऐसा इसलिए नहीं है कि श्रीकृष्ण अर्जुन के घनिष्ठ मित्र हैं, अतः वह उन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, परम सत्य कहकर उनकी चाटुकारिता कर रहा है। अर्जुन इन दो श्लोकों में जो कुछ कहता है, उसकी पुष्टि वैदिक सत्य द्वारा होती है। वैदिक विधान दृढ़ता से कहते हैं कि केवल वही, जो परमेश्वर की भक्ति को अपनाता है, उन्हें समझ सकता है, जबकि अन्य नहीं समझ सकते। अर्जुन द्वारा कहे गए इस श्लोक के प्रत्येक शब्द की पुष्टि वैदिक विधान द्वारा होती है।
केन उपनिषद् में कहा गया है कि परब्रह्म प्रत्येक वस्तु का आश्रय हैं, और श्रीकृष्ण पहले ही समझा चुके हैं कि सब कुछ उन्हीं पर आश्रित है। मुण्डक उपनिषद् पुष्टि करती है कि परमेश्वर, जिनमें सब कुछ आश्रित है, का साक्षात्कार केवल वे ही कर सकते हैं जो निरन्तर उनका चिन्तन करने में संलग्न रहते हैं। श्रीकृष्ण का यह निरन्तर चिन्तन स्मरणम् है, जो भक्ति की विधियों में से एक है। श्रीकृष्ण की भक्ति के द्वारा ही मनुष्य अपनी स्थिति को समझ सकता है तथा इस भौतिक शरीर से छुटकारा पा सकता है।
वेदों में परमेश्वर को पवित्रों में परम पवित्र रूप में स्वीकार किया गया है। जो यह समझता है कि श्रीकृष्ण पवित्रों में परम पवित्र हैं, वह समस्त पापकर्मों से पवित्र हो सकता है। मनुष्य तब तक पापकर्मों से विसंक्रमित नहीं हो सकता जब तक वह परमेश्वर के प्रति शरणागत न हो जाए। श्रीकृष्ण को परम पवित्र रूप में अर्जुन की स्वीकृति वैदिक साहित्य के विधानों के अनुरूप है। इसकी पुष्टि महान् पुरुषों द्वारा भी होती है, जिनमें नारद प्रमुख हैं।
श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और मनुष्य को सदा उनका ध्यान करना चाहिए तथा उनके साथ अपने दिव्य सम्बन्ध का आनन्द लेना चाहिए। वे परम अस्तित्व हैं। वे शारीरिक आवश्यकताओं, जन्म तथा मृत्यु से मुक्त हैं। न केवल अर्जुन इसकी पुष्टि करता है, अपितु समस्त वैदिक साहित्य, पुराण तथा इतिहास भी। समस्त वैदिक साहित्य में श्रीकृष्ण का इसी प्रकार वर्णन है, और परमेश्वर स्वयं भी चौथे अध्याय में कहते हैं, “यद्यपि मैं अजन्मा हूँ, तथापि मैं धार्मिक सिद्धान्तों की स्थापना हेतु इस पृथ्वी पर प्रकट होता हूँ।” वे परम उद्गम हैं; उनका कोई कारण नहीं है, क्योंकि वे समस्त कारणों के कारण हैं, और प्रत्येक वस्तु उन्हीं से उद्भूत हो रही है। यह पूर्ण ज्ञान परमेश्वर की कृपा से प्राप्त किया जा सकता है।
यहाँ अर्जुन श्रीकृष्ण की कृपा से अपने को अभिव्यक्त करता है। यदि हम भगवद्गीता को समझना चाहते हैं, तो हमें इन दो श्लोकों के कथनों को स्वीकार करना चाहिए। इसे परम्परा-पद्धति, अर्थात् गुरु-परम्परा की स्वीकृति, कहते हैं। जब तक मनुष्य गुरु-परम्परा में नहीं है, तब तक वह भगवद्गीता को नहीं समझ सकता। यह तथाकथित शैक्षणिक शिक्षा द्वारा सम्भव नहीं है। दुर्भाग्यवश, जो अपनी शैक्षणिक शिक्षा पर गर्व करते हैं, वे वैदिक साहित्य में इतने प्रमाण होते हुए भी, अपने इस हठीले विश्वास से चिपके रहते हैं कि श्रीकृष्ण एक साधारण व्यक्ति हैं।