हि

अध्याय 10 · 24 / 40

10.26

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ २६ ॥

अश्वत्थः—वटवृक्ष; सर्व-वृक्षाणाम्—समस्त वृक्षों में; देवर्षीणाम्—देवताओं में जो ऋषि हैं उनमें; च—और; नारदः—नारद; गन्धर्वाणाम्—गन्धर्वलोक के निवासियों में; चित्ररथः—चित्ररथ; सिद्धानाम्—समस्त सिद्धों में; कपिलः मुनिः—कपिल मुनि।

समस्त वृक्षों में मैं पवित्र अश्वत्थ वृक्ष हूँ, तथा ऋषियों एवं देवताओं में मैं नारद हूँ। देवताओं के गायकों [गन्धर्वों] में मैं चित्ररथ हूँ, तथा सिद्धों में मैं कपिल मुनि हूँ।

अश्वत्थ वृक्ष सबसे सुन्दर तथा ऊँचे वृक्षों में से एक है, और भारत में लोग प्रायः अपने नित्य प्रातःकालीन अनुष्ठानों में से एक के रूप में इसकी पूजा करते हैं। देवताओं में वे नारद की भी पूजा करते हैं, जो ब्रह्माण्ड में सबसे महान् भक्त माने जाते हैं। इस प्रकार वे भक्त के रूप में श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि हैं। गन्धर्वलोक ऐसे जीवों से परिपूर्ण है जो सुन्दर गायन करते हैं, और उनमें सबसे उत्तम गायक चित्ररथ हैं। नित्य रहने वाले जीवों में कपिल को श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है, और उनके दर्शन का उल्लेख श्रीमद्भागवत में हुआ है। कालान्तर में एक अन्य कपिल प्रसिद्ध हुए, किन्तु उनका दर्शन नास्तिक था। अतः उन दोनों में महान् अन्तर है।