हि

अध्याय 10 · 23 / 40

10.25

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥

महर्षीणाम्—महान् ऋषियों में; भृगुः—भृगु; अहम्—मैं हूँ; गिराम्—ध्वनि-कम्पनों में; अस्मि—मैं हूँ; एकम् अक्षरम्—प्रणव; यज्ञानाम्—यज्ञों में; जप-यज्ञः—जप; अस्मि—मैं हूँ; स्थावराणाम्—अचल वस्तुओं में; हिमालयः—हिमालय पर्वत।

महान् ऋषियों में मैं भृगु हूँ; ध्वनि-कम्पनों में मैं दिव्य ओंकार हूँ। यज्ञों में मैं पवित्र नामों का जप [जप-यज्ञ] हूँ, तथा अचल वस्तुओं में मैं हिमालय हूँ।

ब्रह्मा, जो ब्रह्माण्ड के भीतर सर्वप्रथम जीव हैं, ने विभिन्न प्रकार की जातियों के प्रसार के लिए अनेक पुत्र उत्पन्न किए। उनके पुत्रों में सर्वाधिक शक्तिशाली भृगु हैं, जो सबसे महान् ऋषि भी हैं। समस्त दिव्य ध्वनि-कम्पनों में “ओम्” (ओंकार) परम का प्रतिनिधित्व करता है। समस्त यज्ञों में हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप श्रीकृष्ण का सर्वाधिक शुद्ध प्रतिनिधित्व है। कभी-कभी पशु-यज्ञों की अनुशंसा की जाती है, किन्तु हरे कृष्ण, हरे कृष्ण के यज्ञ में हिंसा का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह सरलतम तथा शुद्धतम है। संसार में जो कुछ भी उदात्त है, वह श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व है। अतः हिमालय, जो संसार के सबसे विशाल पर्वत हैं, भी उन्हीं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मेरु नामक पर्वत का उल्लेख एक पूर्ववर्ती श्लोक में हुआ था, किन्तु मेरु कभी-कभी चल भी होता है, जबकि हिमालय कभी चल नहीं होता। इस प्रकार हिमालय मेरु से भी श्रेष्ठ है।