हि

अध्याय 10 · 28 / 40

10.30

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥

प्रह्लादः—प्रह्लाद; च—भी; अस्मि—मैं हूँ; दैत्यानाम्—असुरों में; कालः—समय; कलयताम्—दमन करने वालों में; अहम्—मैं हूँ; मृगाणाम्—पशुओं में; च—और; मृगेन्द्रः—सिंह; अहम्—मैं हूँ; वैनतेयः—गरुड़; च—भी; पक्षिणाम्—पक्षियों में।

दैत्य असुरों में मैं भक्त प्रह्लाद हूँ; दमन करने वालों में मैं समय हूँ; पशुओं में मैं सिंह हूँ, तथा पक्षियों में मैं विष्णु के पंखयुक्त वाहन गरुड़ हूँ।

दिति तथा अदिति दो बहनें हैं। अदिति के पुत्र आदित्य कहलाते हैं, और दिति के पुत्र दैत्य कहलाते हैं। समस्त आदित्य भगवान् के भक्त हैं, और समस्त दैत्य नास्तिक हैं। यद्यपि प्रह्लाद का जन्म दैत्यों के कुल में हुआ था, तथापि वे बाल्यकाल से ही महान् भक्त थे। अपनी भक्ति तथा ईश्वरीय स्वभाव के कारण वे श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि माने जाते हैं।

दमन के अनेक सिद्धान्त हैं, किन्तु समय भौतिक ब्रह्माण्ड की समस्त वस्तुओं को क्षीण कर देता है और इस प्रकार श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करता है। अनेक पशुओं में सिंह सबसे शक्तिशाली तथा क्रूर है, और पक्षियों की लाखों जातियों में भगवान् विष्णु के वाहक गरुड़ सबसे महान् हैं।