हि

अध्याय 10 · 29 / 40

10.31

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥

पवनः—वायु; पवताम्—समस्त पवित्र करने वालों में; अस्मि—मैं हूँ; रामः—राम; शस्त्र-भृताम्—शस्त्रधारियों में; अहम्—मैं हूँ; झषाणाम्—समस्त जलचरों में; मकरः—मगर; च अस्मि—मैं भी हूँ; स्रोतसाम्—प्रवाहित नदियों में; अस्मि—मैं हूँ; जाह्नवी—गंगा नदी।

पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ; शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ; मछलियों में मैं मगर हूँ, और प्रवाहित नदियों में मैं गंगा हूँ।

समस्त जलचरों में मगर सबसे बड़े जीवों में से एक है, और मनुष्य के लिए निश्चय ही सर्वाधिक घातक है। अतः मगर श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करता है। और नदियों में भारत की सबसे महान् नदी माता गंगा हैं। रामायण के भगवान् श्रीरामचन्द्र, जो श्रीकृष्ण के अवतार हैं, योद्धाओं में सर्वाधिक पराक्रमी हैं।