हि

अध्याय 10 · 35 / 40

10.37

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥

वृष्णीनाम्—वृष्णिवंशियों में; वासुदेवः—द्वारका में श्रीकृष्ण; अस्मि—मैं हूँ; पाण्डवानाम्—पाण्डवों में; धनञ्जयः—अर्जुन; मुनीनाम्—मुनियों में; अपि—भी; अहम्—मैं हूँ; व्यासः—समस्त वैदिक साहित्य के संकलनकर्ता व्यास; कवीनाम्—समस्त महान् विचारकों में; उशना—उशना; कविः—विचारक।

वृष्णिवंशियों में मैं वासुदेव हूँ, और पाण्डवों में मैं अर्जुन हूँ। मुनियों में मैं व्यास हूँ, और महान् विचारकों में मैं उशना हूँ।

श्रीकृष्ण आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और वासुदेव श्रीकृष्ण के अव्यवहित विस्तार हैं। भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलदेव दोनों ही वसुदेव के पुत्रों के रूप में प्रकट होते हैं। पाण्डु के पुत्रों में अर्जुन प्रसिद्ध तथा शूरवीर हैं। वस्तुतः वे श्रेष्ठ पुरुष हैं, अतः वे श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुनियों, अर्थात् वैदिक ज्ञान में पारंगत विद्वानों में व्यास सबसे महान् हैं, क्योंकि उन्होंने इस कलियुग में जनसामान्य की समझ के लिए वैदिक ज्ञान को अनेक भिन्न-भिन्न प्रकारों से समझाया। और व्यास श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में भी ज्ञात हैं; अतः व्यास भी श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं। कवि वे हैं जो किसी भी विषय पर भली-भाँति विचार करने में समर्थ होते हैं। कवियों में उशना असुरों के गुरु थे; वे अत्यन्त बुद्धिमान्, दूरदर्शी, तथा प्रत्येक दृष्टि से राजनैतिक एवं आध्यात्मिक थे। अतः उशना श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य के एक अन्य प्रतिनिधि हैं।