हि

अध्याय 10 · 8 / 40

10.9

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥

मत्-चित्ताः—मन में पूर्णतः मुझमें संलग्न; मत्-गत-प्राणाः—श्रीकृष्ण की सेवा में अर्पित जीवन वाले; बोधयन्तः—प्रचार करते हुए; परस्परम्—आपस में; कथयन्तः च—बातें भी करते हुए; माम्—मेरे विषय में; नित्यम्—निरन्तर; तुष्यन्ति—प्रसन्न होते हैं; च—भी; रमन्ति—दिव्य आनन्द भोगते हैं; च—भी।

मेरे शुद्ध भक्तों के विचार मुझमें ही निवास करते हैं, उनके जीवन मुझे समर्पित रहते हैं, और वे एक-दूसरे को प्रबुद्ध करते हुए तथा मेरे विषय में वार्तालाप करते हुए महान् सन्तोष तथा आनन्द का अनुभव करते हैं।

शुद्ध भक्त, जिनके लक्षण यहाँ वर्णित हैं, स्वयं को भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में पूर्णतः संलग्न कर लेते हैं। उनका मन श्रीकृष्ण के चरणकमलों से विचलित नहीं हो सकता। उनकी बातें मात्र दिव्य विषयों पर होती हैं। शुद्ध भक्तों के लक्षण इस श्लोक में विशेष रूप से वर्णित हैं। परमेश्वर के भक्तगण चौबीसों घण्टे परमेश्वर की लीलाओं का गुणगान करने में संलग्न रहते हैं। उनके हृदय तथा आत्मा निरन्तर श्रीकृष्ण में निमग्न रहते हैं, और वे अन्य भक्तों के साथ उनकी चर्चा करने में आनन्द लेते हैं।

भक्ति की प्रारम्भिक अवस्था में वे सेवा से ही दिव्य आनन्द का आस्वादन करते हैं, और परिपक्व अवस्था में वे वस्तुतः ईश्वर-प्रेम में स्थित हो जाते हैं। उस दिव्य स्थिति में स्थित होने पर, वे उस सर्वोच्च सिद्धि का आस्वादन कर सकते हैं जिसे भगवान् अपने धाम में प्रकट करते हैं। भगवान् चैतन्य दिव्य भक्ति की तुलना जीव के हृदय में एक बीज बोने से करते हैं। ब्रह्माण्ड के विभिन्न लोकों में भ्रमण करते हुए असंख्य जीव हैं, और उनमें से कुछ ही इतने भाग्यशाली होते हैं कि किसी शुद्ध भक्त से मिलें और भक्ति को समझने का अवसर पाएँ। यह भक्ति ठीक एक बीज के समान है, और यदि वह जीव के हृदय में बोया जाए, और यदि वह हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का श्रवण तथा कीर्तन करता रहे, तो वह बीज फलित होता है, ठीक जैसे वृक्ष का बीज नियमित जल-सिंचन से फलित होता है। भक्तिरूपी आध्यात्मिक पौधा धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, यहाँ तक कि वह भौतिक ब्रह्माण्ड के आवरण को भेदकर आध्यात्मिक आकाश में ब्रह्मज्योति तेज में प्रवेश कर जाता है। आध्यात्मिक आकाश में भी वह पौधा और अधिक बढ़ता जाता है, यहाँ तक कि वह उस सर्वोच्च लोक तक पहुँच जाता है जिसे गोलोक वृन्दावन, श्रीकृष्ण का परम लोक, कहते हैं। अन्ततः वह पौधा श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण लेता है और वहीं विश्राम करता है। धीरे-धीरे, जैसे एक पौधा फल तथा पुष्प उत्पन्न करता है, वैसे ही वह भक्तिरूपी पौधा भी फल उत्पन्न करता है, और कीर्तन तथा श्रवण के रूप में जल-सिंचन की प्रक्रिया चलती रहती है। इस भक्तिरूपी पौधे का पूर्ण वर्णन चैतन्य-चरितामृत में किया गया है। वहाँ यह समझाया गया है कि जब सम्पूर्ण पौधा परमेश्वर के चरणकमलों की शरण ले लेता है, तब मनुष्य ईश्वर-प्रेम में पूर्णतः निमग्न हो जाता है; तब वह परमेश्वर के सम्पर्क के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता, ठीक जैसे मछली जल के बिना नहीं रह सकती। ऐसी अवस्था में भक्त परमेश्वर के सम्पर्क में वस्तुतः दिव्य गुणों को प्राप्त कर लेता है।

श्रीमद्भागवत भी परमेश्वर तथा उनके भक्तों के बीच के सम्बन्ध के ऐसे वर्णन से परिपूर्ण है; अतः श्रीमद्भागवत भक्तगण को अत्यन्त प्रिय है। इस वर्णन में भौतिक क्रियाओं, इन्द्रियतृप्ति अथवा मुक्ति के विषय में कुछ नहीं है। श्रीमद्भागवत ही एकमात्र ऐसा वर्णन है जिसमें परमेश्वर तथा उनके भक्तों के दिव्य स्वरूप का पूर्ण वर्णन है। इस प्रकार कृष्णभावनामृत में स्थित अनुभूत आत्माएँ ऐसे दिव्य साहित्य के श्रवण में निरन्तर आनन्द लेती हैं, ठीक जैसे एक युवक तथा युवती संगति में आनन्द लेते हैं।