हि

अध्याय 11 · 12 / 52

11.13

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥

तत्र—वहाँ; एकस्थम्—एक स्थान में; जगत्—ब्रह्माण्ड; कृत्स्नम्—पूर्णतया; प्रविभक्तम्—विभाजित; अनेकधा—अनेक प्रकार से; अपश्यत्—देख सके; देव-देवस्य—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के; शरीरे—विश्वरूप में; पाण्डवः—अर्जुन; तदा—उस समय।

उस समय अर्जुन भगवान् के विश्वरूप में ब्रह्माण्ड के असीम विस्तारों को एक ही स्थान में स्थित देख सके, यद्यपि वे अनेक-अनेक सहस्रों भागों में विभाजित थे।

“तत्र” (वहाँ) शब्द अत्यन्त सार्थक है। यह इंगित करता है कि जब अर्जुन ने विश्वरूप देखा, तब अर्जुन तथा श्रीकृष्ण दोनों रथ पर विराजमान थे। युद्धभूमि पर उपस्थित अन्य लोग इस रूप को नहीं देख सके, क्योंकि श्रीकृष्ण ने यह दृष्टि केवल अर्जुन को ही प्रदान की थी। अर्जुन श्रीकृष्ण के शरीर में अनेक सहस्रों ब्रह्माण्डों को देख सके। जैसा कि हम वैदिक शास्त्रों से जानते हैं, अनेक ब्रह्माण्ड तथा अनेक लोक हैं। उनमें से कुछ मिट्टी के बने हैं, कुछ स्वर्ण के, कुछ रत्नों के, कुछ अत्यन्त विशाल हैं, कुछ इतने विशाल नहीं हैं, इत्यादि। अपने रथ पर विराजमान अर्जुन इन समस्त ब्रह्माण्डों को देख सके। किन्तु अर्जुन तथा श्रीकृष्ण के बीच जो कुछ घटित हो रहा था, उसे कोई समझ नहीं सका।