अध्याय 11 · 11 / 52
11.12
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥
दिवि—आकाश में; सूर्य—सूर्य; सहस्रस्य—सहस्रों के; भवेत्—वहाँ हों; युगपत्—एक साथ; उत्थिता—उदित; यदि—यदि; भाः—प्रकाश; सदृशी—उसके समान; सा—वह; स्यात्—हो; भासः—तेज; तस्य—वहाँ है; महात्मनः—महान् भगवान् का।
यदि आकाश में सहस्रों सूर्य एक साथ उदित हो उठें, तो उनका प्रकाश सम्भवतः उस विश्वरूप में परम पुरुष के तेज के समान हो।
अर्जुन ने जो देखा, वह अवर्णनीय था; तथापि सञ्जय धृतराष्ट्र के समक्ष उस महान् दर्शन का एक मानसिक चित्र प्रस्तुत करने का प्रयत्न कर रहे हैं। न तो सञ्जय वहाँ उपस्थित थे और न धृतराष्ट्र; किन्तु सञ्जय व्यास की कृपा से जो कुछ घटित हुआ, उसे देख सके। अतः अब वे उस परिस्थिति की तुलना, जहाँ तक उसे समझा जा सकता है, एक कल्पनीय घटना (अर्थात् सहस्रों सूर्य) से करते हैं।