हि

अध्याय 11 · 14 / 52

11.15

अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥

अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; पश्यामि—मैं देखता हूँ; देवान्—समस्त देवताओं को; तव—आपके; देव—हे भगवन्; देहे—शरीर में; सर्वान्—समस्त; तथा—भी; भूत—जीव; विशेष-सङ्घान्—विशेष रूप से एकत्रित; ब्रह्माणम्—ब्रह्मा को; ईशम्—शिव को; कमल-आसन-स्थम्—कमल-पुष्प पर विराजमान; ऋषीन्—महान् ऋषियों को; च—भी; सर्वान्—समस्त; उरगान्—सर्पों को; च—भी; दिव्यान्—दिव्य।

अर्जुन ने कहा : हे प्रिय भगवान् श्रीकृष्ण, मैं आपके शरीर में समस्त देवताओं तथा विविध अन्य जीवों को एकत्रित देख रहा हूँ। मैं कमल-पुष्प पर विराजमान ब्रह्मा को, तथा भगवान् शिव को, और अनेक ऋषियों तथा दिव्य सर्पों को भी देख रहा हूँ।

अर्जुन ब्रह्माण्ड में सब कुछ देखते हैं; अतः वे ब्रह्मा को देखते हैं, जो ब्रह्माण्ड के प्रथम जीव हैं, तथा उस दिव्य सर्प को भी, जिस पर ब्रह्माण्ड के अधोभाग में गर्भोदकशायी विष्णु शयन करते हैं। इस सर्प-शय्या को वासुकि कहा जाता है। वासुकि नाम के अन्य सर्प भी हैं। अर्जुन गर्भोदकशायी विष्णु से लेकर ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च भाग में स्थित उस कमल-पुष्प लोक तक देख सकते हैं, जहाँ ब्रह्माण्ड के प्रथम जीव ब्रह्मा निवास करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि आदि से अन्त तक सब कुछ अर्जुन एक ही स्थान पर अपने रथ पर बैठकर देख सके। यह परमेश्वर श्रीकृष्ण की कृपा से ही सम्भव हुआ।