हि

अध्याय 11 · 15 / 52

11.16

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥

अनेक—अनेक; बाहू—भुजाएँ; उदर—उदर; वक्त्र—मुख; नेत्रम्—नेत्र; पश्यामि—मैं देखता हूँ; त्वाम्—आपको; सर्वतः—सब ओर से; अनन्त-रूपम्—असीम रूप; न अन्तम्—कोई अन्त नहीं है; न मध्यम्—कोई मध्य नहीं है; न पुनः—न ही फिर; तव—आपका; आदिम्—आदि; पश्यामि—मैं देखता हूँ; विश्वेश्वर—हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; विश्व-रूप—ब्रह्माण्ड के रूप में।

हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, मैं आपके विश्व-शरीर में अनेक-अनेक रूपों—उदरों, मुखों, नेत्रों—को असीम रूप से विस्तृत देख रहा हूँ। इस सबका न कोई अन्त है, न कोई आदि है, और न ही कोई मध्य है।

श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और असीम हैं; अतः उनके माध्यम से सब कुछ देखा जा सकता है।