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अध्याय 11 · 2 / 52

11.2

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥

भव—प्राकट्य; अप्ययौ—अप्राकट्य; हि—निश्चय ही; भूतानाम्—समस्त जीवों के; श्रुतौ—सुने गए हैं; विस्तरशः—विस्तारपूर्वक; मया—मेरे द्वारा; त्वत्तः—आपसे; कमल-पत्राक्ष—हे कमलनयन; माहात्म्यम्—महिमा; अपि—भी; च—और; अव्ययम्—अक्षय।

हे कमलनयन, मैंने आपसे प्रत्येक जीव के प्राकट्य तथा अप्राकट्य के विषय में विस्तारपूर्वक सुना है, जिसका अनुभव मुझे आपकी अक्षय महिमा के द्वारा हुआ है।

अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण को अपने हर्ष के कारण “कमलनयन” कहकर सम्बोधित करते हैं (श्रीकृष्ण के नेत्र ठीक कमल-पुष्प की पंखुड़ियों के समान प्रतीत होते हैं), क्योंकि पिछले अध्याय के अन्तिम श्लोक में श्रीकृष्ण ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वे अपने एक अंशमात्र से समस्त ब्रह्माण्ड को धारण किए हुए हैं। इस भौतिक प्रकटीकरण में जो कुछ है, उसके वे उद्गम हैं, और अर्जुन ने यह बात भगवान् से विस्तारपूर्वक सुनी है। अर्जुन यह भी जानते हैं कि समस्त प्राकट्य तथा अप्राकट्य के उद्गम होते हुए भी वे उनसे पृथक् रहते हैं। यद्यपि वे सर्वव्यापी हैं, तथापि उनका व्यक्तित्व लुप्त नहीं होता। यही श्रीकृष्ण का अचिन्त्य ऐश्वर्य है, जिसे भली-भाँति समझ लेने की बात अर्जुन स्वीकार करते हैं।