अध्याय 11 · 1 / 52
11.1
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; मत्-अनुग्रहाय—मुझ पर अनुग्रह करने के लिए; परमम्—परम; गुह्यम्—गोपनीय; अध्यात्म—आध्यात्मिक; संज्ञितम्—विषय में; यत्—जो; त्वया—आपके द्वारा; उक्तम्—कहा गया; वचः—वचन; तेन—उससे; मोहः—मोह; अयम्—यह; विगतः—दूर हुआ; मम—मेरा।
अर्जुन ने कहा : आपने अत्यन्त कृपापूर्वक मुझे गोपनीय आध्यात्मिक विषयों का जो उपदेश दिया, उसे सुनकर अब मेरा मोह दूर हो गया है।
यह अध्याय श्रीकृष्ण को समस्त कारणों के कारण के रूप में प्रकट करता है। वे महाविष्णु के भी कारण हैं, और उन्हीं से भौतिक ब्रह्माण्ड उद्भूत होते हैं। श्रीकृष्ण कोई अवतार नहीं हैं; वे समस्त अवतारों के उद्गम हैं। यह बात पिछले अध्याय में पूर्णतया समझाई जा चुकी है।
अब, जहाँ तक अर्जुन का सम्बन्ध है, वे कहते हैं कि उनका मोह दूर हो गया है। इसका अर्थ यह है कि अर्जुन अब श्रीकृष्ण को केवल एक मनुष्य अथवा अपना मित्र मात्र नहीं मानते, अपितु समस्त वस्तुओं का उद्गम मानते हैं। अर्जुन अत्यन्त प्रबुद्ध हैं और प्रसन्न हैं कि उन्हें श्रीकृष्ण जैसा महान् मित्र प्राप्त है; किन्तु अब वे यह विचार कर रहे हैं कि यद्यपि वे स्वयं श्रीकृष्ण को समस्त वस्तुओं का उद्गम स्वीकार कर लें, तथापि अन्य लोग ऐसा न करें। अतः सबके लिए श्रीकृष्ण की दिव्यता को प्रतिष्ठित करने हेतु, वे इस अध्याय में श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि वे अपना विश्वरूप दिखलाएँ। वस्तुतः जब कोई श्रीकृष्ण के विश्वरूप का दर्शन करता है, तो वह अर्जुन के समान भयभीत हो जाता है; किन्तु श्रीकृष्ण इतने कृपालु हैं कि उसे दिखलाने के पश्चात् वे पुनः अपने मूल रूप में प्रकट हो जाते हैं। अर्जुन कई बार श्रीकृष्ण की बात से सहमति प्रकट करते हैं। श्रीकृष्ण केवल उनके कल्याण के लिए ही उनसे बोल रहे हैं, और अर्जुन स्वीकार करते हैं कि यह सब उन्हें श्रीकृष्ण की कृपा से ही प्राप्त हो रहा है। अब उन्हें यह विश्वास हो चुका है कि श्रीकृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं और परमात्मा रूप में सबके हृदय में विद्यमान हैं।