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अध्याय 11 · 29 / 52

11.31

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥

ākhyāhi—कृपया बताएँ; me—मुझे; kaḥ—कौन; bhavān—आप; ugra-rūpaḥ—भयंकर रूप; namaḥ astu—नमस्कार; te—आपको; deva-vara—देवताओं में श्रेष्ठ; prasīda—कृपालु हों; vijñātum—जानने हेतु; icchāmi—मैं चाहता हूँ; bhavantam—आपको; ādyam—आदि; na—कभी नहीं; hi—निश्चय ही; prajānāmi—जानता हूँ; tava—आपका; pravṛttim—प्रयोजन।

हे ईश्वरों के ईश्वर, इतने भयंकर रूप वाले, कृपया मुझे बताएँ कि आप कौन हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ; मुझ पर कृपालु हों। मैं नहीं जानता कि आपका प्रयोजन क्या है, और मैं उसे सुनने की इच्छा रखता हूँ।