हि

अध्याय 11 · 28 / 52

11.30

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता-
ल्लोकान्समग्रान्वदनैज्र्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३० ॥

lelihyase—चाटते हुए; grasamānaḥ—निगलते हुए; samantāt—समस्त दिशाओं से; lokān—लोगों को; samagrān—पूर्णतः; vadanaiḥ—मुखों द्वारा; jvaladbhiḥ—प्रज्वलित; tejobhiḥ—तेज से; āpūrya—आच्छादित करते हुए; jagat—विश्व को; samagram—समस्त; bhāsaḥ—प्रकाशित करते हुए; tava—आपका; ugrāḥ—भयंकर; pratapanti—झुलसाते हुए; viṣṇo—हे सर्वव्यापी प्रभु।

हे विष्णु, मैं देख रहा हूँ कि आप समस्त लोगों को अपने ज्वलित मुखों में निगल रहे हैं और अपनी अपरिमेय किरणों से विश्व को आच्छादित कर रहे हैं। लोकों को झुलसाते हुए आप प्रकट हैं।