हि

अध्याय 11 · 4 / 52

11.4

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥

मन्यसे—यदि आप सोचते हैं; यदि—यदि; तत्—वह; शक्यम्—देखने में समर्थ; मया—मेरे द्वारा; द्रष्टुम्—देखने के लिए; इति—इस प्रकार; प्रभो—हे प्रभु; योगेश्वर—समस्त योगशक्ति के स्वामी; ततः—तब; मे—मुझे; त्वम्—आप; दर्शय—दिखलाइए; आत्मानम्—स्वयं को; अव्ययम्—नित्य।

हे मेरे प्रभु, हे समस्त योगशक्ति के स्वामी, यदि आप यह समझते हैं कि मैं आपके विश्वरूप को देखने में समर्थ हूँ, तो कृपया मुझे वह विश्व-स्वरूप दिखलाइए।

कहा जाता है कि भौतिक इन्द्रियों के द्वारा परमेश्वर श्रीकृष्ण को न तो कोई देख सकता है, न सुन सकता है, न समझ सकता है और न ही उनका अनुभव कर सकता है। किन्तु यदि कोई आरम्भ से ही भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न रहे, तो वह प्राकट्य के द्वारा भगवान् का दर्शन कर सकता है। प्रत्येक जीव केवल एक आध्यात्मिक स्फुलिंग है; अतः परमेश्वर को देख पाना अथवा समझ पाना सम्भव नहीं है। अर्जुन एक भक्त के रूप में अपनी तर्क-शक्ति पर निर्भर नहीं करते; अपितु वे एक जीव के रूप में अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हैं और श्रीकृष्ण की अनुपम स्थिति को मानते हैं। अर्जुन यह समझ सकते थे कि किसी जीव के लिए असीम अनन्त को समझ पाना सम्भव नहीं है। यदि वह अनन्त स्वयं को प्रकट करे, तो उस अनन्त की कृपा से ही उस अनन्त के स्वरूप को समझना सम्भव होता है। यहाँ “योगेश्वर” शब्द भी अत्यन्त सार्थक है, क्योंकि भगवान् के पास अचिन्त्य शक्ति है। यद्यपि वे असीम हैं, तथापि यदि वे चाहें तो अपनी कृपा से स्वयं को प्रकट कर सकते हैं। अतएव अर्जुन श्रीकृष्ण की उस अचिन्त्य कृपा के लिए विनती करते हैं। वे श्रीकृष्ण को आदेश नहीं देते। श्रीकृष्ण किसी के समक्ष स्वयं को प्रकट करने के लिए बाध्य नहीं हैं, जब तक कि वह कृष्णभावनामृत में पूर्णतया शरणागत होकर भक्ति में संलग्न न हो। इस प्रकार जो लोग अपनी मानसिक कल्पना के बल पर निर्भर रहते हैं, उनके लिए श्रीकृष्ण को देख पाना सम्भव नहीं है।