हि

अध्याय 11 · 5 / 52

11.5

श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥

श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; पश्य—देखो; मे—मेरे; पार्थ—हे पृथापुत्र; रूपाणि—रूपों को; शतशः—सैकड़ों; अथ—भी; सहस्रशः—सहस्रों; नाना-विधानि—विविध प्रकार के; दिव्यानि—दिव्य; नाना—विविध; वर्ण—रंग के; आकृतीनि—रूप; च—भी।

श्रीभगवान् ने कहा : हे प्रिय अर्जुन, हे पृथापुत्र, अब तुम मेरे ऐश्वर्यों को देखो—सैकड़ों-सहस्रों विविध दिव्य रूप, जो समुद्र के समान बहुरंगी हैं।

अर्जुन श्रीकृष्ण को उनके विश्वरूप में देखना चाहते थे, जो यद्यपि एक दिव्य रूप है, तथापि केवल विश्व-प्रकटीकरण हेतु प्रकट होता है और अतः इस भौतिक प्रकृति के नश्वर काल के अधीन रहता है। जिस प्रकार भौतिक प्रकृति कभी प्रकट होती है और कभी अप्रकट, उसी प्रकार श्रीकृष्ण का यह विश्वरूप भी कभी प्रकट और कभी अप्रकट रहता है। यह श्रीकृष्ण के अन्य रूपों की भाँति आध्यात्मिक आकाश में नित्य स्थित नहीं रहता। जहाँ तक किसी भक्त का सम्बन्ध है, वह विश्वरूप देखने का इच्छुक नहीं होता; किन्तु चूँकि अर्जुन श्रीकृष्ण को इस रूप में देखना चाहते थे, अतः श्रीकृष्ण इस रूप को प्रकट करते हैं। इस विश्वरूप को किसी साधारण मनुष्य द्वारा देखा जाना सम्भव नहीं है। श्रीकृष्ण को ही किसी को इसे देखने की शक्ति प्रदान करनी होती है।