हि

अध्याय 11 · 50 / 52

11.53

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥

na—कभी नहीं; aham—मैं; vedaiḥ—वेदों के अध्ययन से; na—कभी नहीं; tapasā—गम्भीर तपस्याओं से; na—कभी नहीं; dānena—दान से; na—कभी नहीं; ca—भी; ijyayā—पूजा से; śakyaḥ—यह सम्भव है; evam-vidhaḥ—इस प्रकार; draṣṭum—देखना; dṛṣṭavān—देखते हुए; asi—तुम हो; mām—मुझे; yathā—जैसे।

जिस रूप को तुम अपने दिव्य नेत्रों से देख रहे हो, उसे केवल वेदों का अध्ययन करने से, न गम्भीर तपस्याएँ करने से, न दान से, न पूजा से समझा जा सकता है। इन साधनों से मनुष्य मुझे, जैसा मैं हूँ, वैसा नहीं देख सकता।

श्रीकृष्ण सर्वप्रथम अपने माता-पिता देवकी तथा वसुदेव के समक्ष चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए, और फिर उन्होंने स्वयं को द्विभुज रूप में रूपान्तरित कर लिया। यह रहस्य उनके लिए समझना अत्यन्त कठिन है जो नास्तिक हैं अथवा जो भक्ति से रहित हैं। उन विद्वानों के लिए जिन्होंने केवल कल्पना के माध्यम से अथवा मात्र शैक्षणिक रुचि से वैदिक साहित्य का अध्ययन किया है, श्रीकृष्ण को समझना सरल नहीं है। न ही उन व्यक्तियों द्वारा उन्हें समझा जा सकता है जो औपचारिक रूप से पूजा अर्पित करने मन्दिर जाते हैं। वे अपना दर्शन कर लेते हैं, किन्तु वे श्रीकृष्ण को, जैसे वे हैं, नहीं समझ सकते। श्रीकृष्ण को केवल भक्ति के मार्ग से ही समझा जा सकता है, जैसा कि श्रीकृष्ण ने स्वयं अगले श्लोक में समझाया है।