हि

अध्याय 12 · 9 / 16

12.11

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥

अथ—यद्यपि; एतत्—यह; अपि—भी; अशक्तः—असमर्थ; असि—तुम हो; कर्तुम्—करने में; मत्—मेरी; योगम्—भक्ति का; आश्रितः—आश्रय लेकर; सर्व-कर्म—समस्त क्रियाओं के; फल—फल; त्यागम्—त्याग हेतु; ततः—अतएव; कुरु—करो; यत-आत्मवान्—आत्मस्थित।

किन्तु यदि तुम इस भावना में कार्य करने में भी असमर्थ हो, तो अपने कार्य के समस्त फलों का त्याग करते हुए कार्य करने का तथा आत्मस्थित होने का प्रयत्न करो।

ऐसा हो सकता है कि कोई सामाजिक, पारिवारिक अथवा धार्मिक विचारों के कारण, या किन्हीं अन्य बाधाओं के कारण, कृष्णभावनामृत की क्रियाओं के प्रति सहानुभूति भी न रख सके। यदि कोई स्वयं को प्रत्यक्ष रूप से कृष्णभावनामृत की क्रियाओं में संलग्न करता है, तो परिवार के सदस्यों की ओर से आपत्ति हो सकती है, अथवा अन्य अनेक कठिनाइयाँ आ सकती हैं। जिसके सम्मुख ऐसी समस्या हो, उसे परामर्श दिया जाता है कि वह अपनी क्रियाओं के संचित फल को किसी सत्कार्य हेतु अर्पित कर दे। ऐसी विधियाँ वैदिक नियमों में वर्णित हैं। यज्ञों एवं विशेष कर्मों के अनेक वर्णन हैं, अथवा ऐसे विशेष कार्य के, जिसमें मनुष्य के पूर्व कर्म के फल को लगाया जा सकता है। इस प्रकार मनुष्य क्रमशः ज्ञान की अवस्था तक उन्नत हो सकता है। यह भी पाया जाता है कि जब कोई, जिसे कृष्णभावनामृत की क्रियाओं में रुचि भी नहीं है, किसी चिकित्सालय अथवा किसी अन्य सामाजिक संस्था को दान देता है, तब वह अपनी क्रियाओं के कठिन-अर्जित फलों का त्याग करता है। यहाँ इसकी भी अनुशंसा की गई है, क्योंकि अपनी क्रियाओं के फलों का त्याग करने के अभ्यास से मनुष्य निश्चय ही क्रमशः अपने मन को शुद्ध करता है, और मन की उस शुद्ध अवस्था में वह कृष्णभावनामृत को समझने में समर्थ हो जाता है। निःसन्देह कृष्णभावनामृत किसी अन्य अनुभव पर आश्रित नहीं है, क्योंकि कृष्णभावनामृत स्वयं ही मनुष्य के मन को शुद्ध कर सकता है, किन्तु यदि कृष्णभावनामृत में बाधाएँ हों, तो मनुष्य अपने कर्म के फल का त्याग करने का प्रयत्न कर सकता है। इस सन्दर्भ में, समाज-सेवा, समुदाय-सेवा, राष्ट्र-सेवा, अपने देश हेतु त्याग इत्यादि स्वीकार किए जा सकते हैं, जिससे किसी दिन मनुष्य परमेश्वर की शुद्ध भक्ति की अवस्था तक आ सके। भगवद्गीता में हम पाते हैं, यह कहा गया है: यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम्: यदि कोई परम कारण हेतु त्याग करने का निश्चय करता है, यद्यपि वह यह नहीं जानता कि परम कारण श्रीकृष्ण हैं, तो वह यज्ञ की विधि से क्रमशः यह समझ जाएगा कि श्रीकृष्ण ही परम कारण हैं।