अध्याय 12 · 8 / 16
12.10
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥
अभ्यासे—अभ्यास में; अपि—भी; असमर्थः—असमर्थ; असि—तुम हो; मत्-कर्म—मेरा कार्य; परमः—सर्वोच्च; भव—बन जाओ; मत्-अर्थम्—मेरे लिए; अपि—यद्यपि; कर्माणि—कार्य; कुर्वन्—करते हुए; सिद्धिम्—पूर्णता; अवाप्स्यसि—प्राप्त करोगे।
यदि तुम भक्तियोग के विधानों का अभ्यास नहीं कर सकते, तो केवल मेरे लिए कार्य करने का प्रयत्न करो, क्योंकि मेरे लिए कार्य करते हुए तुम पूर्ण अवस्था को प्राप्त होगे।
जो आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में भक्तियोग के नियमित सिद्धान्तों का अभ्यास भी नहीं कर सकता, वह फिर भी परमेश्वर के लिए कार्य करके इस पूर्ण अवस्था की ओर आकृष्ट किया जा सकता है। इस कार्य को किस प्रकार करना है, यह एकादश अध्याय के पचपनवें श्लोक में पहले ही समझाया जा चुका है। मनुष्य को कृष्णभावनामृत के प्रसार के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए। ऐसे अनेक भक्त हैं जो कृष्णभावनामृत के प्रसार में संलग्न हैं, और उन्हें सहायता की आवश्यकता है। अतः यदि कोई प्रत्यक्ष रूप से भक्तियोग के नियमित सिद्धान्तों का अभ्यास नहीं कर सकता, तो भी वह ऐसे कार्य में सहायता करने का प्रयत्न कर सकता है। प्रत्येक प्रयास के लिए भूमि, पूँजी, संगठन एवं श्रम की आवश्यकता होती है। जैसे व्यवसाय में मनुष्य को रहने हेतु स्थान, उपयोग हेतु कुछ पूँजी, कुछ श्रम तथा विस्तार हेतु कुछ संगठन की आवश्यकता होती है, वैसे ही श्रीकृष्ण की सेवा में भी इसकी आवश्यकता है। अन्तर केवल इतना है कि भौतिकवाद में मनुष्य इन्द्रियतृप्ति के लिए कार्य करता है। तथापि वही कार्य श्रीकृष्ण की तुष्टि के लिए सम्पन्न किया जा सकता है, और वही आध्यात्मिक क्रिया है। यदि किसी के पास पर्याप्त धन है, तो वह कृष्णभावनामृत के प्रसार हेतु कार्यालय अथवा मन्दिर के निर्माण में सहायता कर सकता है। अथवा वह प्रकाशनों में सहायता कर सकता है। क्रियाकलाप के विविध क्षेत्र हैं, और मनुष्य को ऐसी क्रियाओं में रुचि लेनी चाहिए। यदि कोई ऐसी क्रियाओं के फल का त्याग नहीं कर सकता, तो वही व्यक्ति कृष्णभावनामृत के प्रसार हेतु कुछ अंश का त्याग कर सकता है। कृष्णभावनामृत के कार्य हेतु यह स्वैच्छिक सेवा किसी को ईश्वर के प्रेम की उच्चतर अवस्था तक उठने में सहायता करेगी, जिससे वह पूर्ण बन जाता है।