अध्याय 13 · 8 / 29
13.14
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १४ ॥
सर्वतः—सर्वत्र; पाणि—हाथ; पादम्—पैर; तत्—वह; सर्वतः—सर्वत्र; अक्षि—नेत्र; शिरः—सिर; मुखम्—मुख; सर्वतः—सर्वत्र; श्रुतिमत्—श्रवण; लोके—संसार में; सर्वम्—सर्वत्र; आवृत्य—आच्छादित करते हुए; तिष्ठति—विद्यमान है।
सर्वत्र उनके हाथ तथा पैर हैं, उनके नेत्र तथा मुख हैं, और वे सब कुछ सुनते हैं। इस प्रकार परमात्मा विद्यमान हैं।
जिस प्रकार सूर्य अपनी असीम किरणें फैलाता हुआ विद्यमान रहता है, उसी प्रकार परमात्मा अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विद्यमान हैं। वे अपने सर्वव्यापी रूप में विद्यमान हैं, और उनमें समस्त व्यष्टि जीव विद्यमान हैं, प्रथम महान् गुरु ब्रह्मा से लेकर छोटी चींटियों तक। असीम सिर, पैर, हाथ तथा नेत्र हैं, और असीम जीव हैं। सब परमात्मा में तथा परमात्मा पर विद्यमान हैं। अतएव परमात्मा सर्वव्यापी हैं। किन्तु व्यष्टि आत्मा यह नहीं कह सकती कि उसके हाथ, पैर तथा नेत्र सर्वत्र हैं। यह सम्भव नहीं है। यदि वह सोचे कि यद्यपि अज्ञान के कारण उसे यह बोध नहीं होता कि उसके हाथ-पैर सर्वत्र फैले हुए हैं, किन्तु जब वह उचित ज्ञान प्राप्त कर लेगा, तब वह उस अवस्था तक पहुँच जाएगा, तो उसका यह सोचना विरोधाभासी है। इसका अर्थ है कि व्यष्टि आत्मा, भौतिक प्रकृति से बद्ध हो जाने के कारण, परम नहीं है। परम व्यष्टि आत्मा से भिन्न है। परमेश्वर अपना हाथ बिना किसी सीमा के फैला सकते हैं; व्यष्टि आत्मा नहीं फैला सकती। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि यदि कोई उन्हें एक पुष्प, या एक फल, या थोड़ा-सा जल अर्पित करे, तो वे स्वीकार करते हैं। यदि भगवान् बहुत दूर हों, तो वे वस्तुएँ किस प्रकार स्वीकार कर सकते हैं? यही भगवान् की सर्वशक्तिमत्ता है : यद्यपि वे अपने ही धाम में, पृथ्वी से बहुत-बहुत दूर स्थित हैं, फिर भी वे जो कोई अर्पित करता है, उसे स्वीकार करने के लिए अपना हाथ फैला सकते हैं। यही उनकी सामर्थ्य है। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, गोलोक एव निवसति : यद्यपि वे सदैव अपने दिव्य लोक में लीलाओं में संलग्न रहते हैं, फिर भी वे सर्वव्यापी हैं। व्यष्टि आत्मा यह दावा नहीं कर सकती कि वह सर्वव्यापी है। अतएव यह श्लोक परम आत्मा, अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का वर्णन करता है, व्यष्टि आत्मा का नहीं।