हि

अध्याय 13 · 9 / 29

13.15

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १५ ॥

सर्वे—समस्त; इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; गुण—गुण; आभासम्—मूल स्रोत; सर्व—समस्त; इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; विवर्जितम्—से रहित; असक्तम्—आसक्ति रहित; सर्व-भृत्—सबका पालनकर्ता; च—भी; एव—निश्चय ही; निर्गुणम्—भौतिक गुणों से रहित; गुण-भोक्तृ—साथ ही गुणों का स्वामी; च—भी।

परमात्मा समस्त इन्द्रियों के मूल स्रोत हैं, फिर भी वे इन्द्रियों से रहित हैं। वे अनासक्त हैं, यद्यपि वे समस्त जीवों के पालनकर्ता हैं। वे प्रकृति के गुणों से परे हैं, और साथ ही वे भौतिक प्रकृति के समस्त गुणों के स्वामी हैं।

परमेश्वर, यद्यपि जीवों की समस्त इन्द्रियों के स्रोत हैं, उनके पास उनके समान भौतिक इन्द्रियाँ नहीं हैं। वस्तुतः व्यष्टि आत्माओं की आध्यात्मिक इन्द्रियाँ होती हैं, किन्तु बद्ध जीवन में वे भौतिक तत्त्वों से आच्छादित हो जाती हैं, और अतएव इन्द्रिय-क्रियाएँ पदार्थ के माध्यम से प्रकट होती हैं। परमेश्वर की इन्द्रियाँ इस प्रकार आच्छादित नहीं हैं। उनकी इन्द्रियाँ दिव्य हैं, और अतएव वे निर्गुण कहलाती हैं। गुण का अर्थ है भौतिक गुण, किन्तु उनकी इन्द्रियाँ भौतिक आवरण से रहित हैं। यह समझना चाहिए कि उनकी इन्द्रियाँ ठीक हमारी जैसी नहीं हैं। यद्यपि वे हमारी समस्त इन्द्रिय-क्रियाओं के स्रोत हैं, उनकी अपनी दिव्य इन्द्रियाँ हैं, जो अदूषित हैं। इसे श्वेताश्वतर उपनिषद् में इस श्लोक में अत्यन्त सुन्दर रीति से समझाया गया है : सर्वतः पाणि-पादम्। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के ऐसे हाथ नहीं हैं जो भौतिक रूप से दूषित हों, किन्तु उनके अपने हाथ हैं और वे जो कोई यज्ञ उन्हें अर्पित किया जाता है, उसे स्वीकार करते हैं। यही बद्ध आत्मा तथा परमात्मा के बीच का भेद है। उनके भौतिक नेत्र नहीं हैं, किन्तु उनके नेत्र हैं—अन्यथा वे किस प्रकार देख सकते? वे सब कुछ देखते हैं—भूत, वर्तमान तथा भविष्य। वे जीव के हृदय के भीतर निवास करते हैं, और वे जानते हैं कि हमने अतीत में क्या किया है, हम अब क्या कर रहे हैं, और भविष्य में हमारी प्रतीक्षा में क्या है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में भी होती है : वे सब कुछ जानते हैं, किन्तु उन्हें कोई नहीं जानता। कहा गया है कि परमेश्वर के हमारे समान पैर नहीं हैं, किन्तु वे समस्त अन्तरिक्ष में भ्रमण कर सकते हैं, क्योंकि उनके आध्यात्मिक पैर हैं। दूसरे शब्दों में, भगवान् निराकार नहीं हैं; उनके अपने नेत्र, पैर, हाथ तथा अन्य सब कुछ है, और चूँकि हम परमेश्वर के अंश हैं, इसलिए हमारे पास भी ये वस्तुएँ हैं। किन्तु उनके हाथ, पैर, नेत्र तथा इन्द्रियाँ भौतिक प्रकृति से दूषित नहीं हैं।

भगवद्गीता यह भी पुष्टि करती है कि जब भगवान् प्रकट होते हैं, तब वे अपनी अन्तरंगा शक्ति द्वारा यथारूप प्रकट होते हैं। वे भौतिक ऊर्जा से दूषित नहीं हैं, क्योंकि वे भौतिक ऊर्जा के स्वामी हैं। वैदिक साहित्य में हम पाते हैं कि उनकी समस्त मूर्ति आध्यात्मिक है। उनका अपना नित्य रूप है, जो सच्चिदानन्द-विग्रह कहलाता है। वे समस्त ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं। वे समस्त सम्पत्ति के स्वामी हैं तथा समस्त ऊर्जा के अधिपति हैं। वे सर्वाधिक बुद्धिमान् हैं तथा ज्ञान से परिपूर्ण हैं। ये पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के कुछ लक्षण हैं। वे समस्त जीवों के पालनकर्ता हैं तथा समस्त कर्मों के साक्षी हैं। जहाँ तक हम वैदिक साहित्य से समझ सकते हैं, परमेश्वर सदैव दिव्य हैं। यद्यपि हम उनका सिर, मुख, हाथ या पैर नहीं देखते, उनके पास ये हैं, और जब हम दिव्य स्थिति तक ऊपर उठ जाते हैं, तब हम भगवान् के रूप को देख सकते हैं। भौतिक रूप से दूषित इन्द्रियों के कारण हम उनके रूप को नहीं देख सकते। अतएव वे निर्विशेषवादी, जो अभी भी भौतिक रूप से प्रभावित हैं, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को नहीं समझ सकते।