अध्याय 13 · 6 / 29
13.8-12
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ८ ॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ९ ॥
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ १० ॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ ११ ॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ १२ ॥
अमानित्वम्—विनम्रता; अदम्भित्वम्—निरभिमानता; अहिंसा—अहिंसा; क्षान्तिः—सहनशीलता; आर्जवम्—सरलता; आचार्य-उपासनम्—प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की शरण ग्रहण करना; शौचम्—स्वच्छता; स्थैर्यम्—दृढ़ता; आत्म-विनिग्रहः—संयम; इन्द्रिय-अर्थेषु—इन्द्रियों के विषय में; वैराग्यम्—त्याग; अनहङ्कारः—मिथ्या अहंकार से रहित होना; एव—निश्चय ही; च—भी; जन्म—जन्म; मृत्यु—मृत्यु; जरा—वृद्धावस्था; व्याधि—रोग; दुःख—दुःख; दोष—दोष; अनुदर्शनम्—अवलोकन करना; असक्तिः—आसक्ति रहित; अनभिष्वङ्गः—संसर्ग रहित; पुत्र—पुत्र; दार—पत्नी; गृह-आदिषु—घर आदि; नित्यम्; च—भी; सम-चित्तत्वम्—समभाव; इष्ट—वांछित; अनिष्टः—अवांछित; उपपत्तिषु—प्राप्त होने पर; मयि—मुझमें; च—भी; अनन्य-योगेन—भक्ति द्वारा; भक्तिः—भक्ति; अव्यभिचारिणी—निरन्तर, अनन्य; विविक्त—एकान्त; देश—स्थान; सेवित्वम्—आकांक्षा करना; अरतिः—आसक्ति रहित; जन—सामान्य जन; संसदि—समूह; अध्यात्म—आत्मा से सम्बन्धित; ज्ञान—ज्ञान; नित्यत्वम्—नित्यता; तत्त्व-ज्ञान—सत्य का ज्ञान; अर्थ—प्रयोजन; दर्शनम्—दर्शन; एतत्—यह सब; ज्ञानम्—ज्ञान; इति—इस प्रकार; प्रोक्तम्—घोषित; अज्ञानम्—अज्ञान; यत्—जो; अतः—इससे; अन्यथा—अन्य।
विनम्रता, निरभिमानता, अहिंसा, सहनशीलता, सरलता, प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की शरण ग्रहण करना, स्वच्छता, दृढ़ता तथा आत्मसंयम; इन्द्रियतृप्ति के विषयों का त्याग, मिथ्या अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दोष का अवलोकन; सन्तान, पत्नी, घर आदि के प्रति अनासक्ति, तथा सुखद एवं अप्रिय घटनाओं के बीच समभाव; मेरे प्रति निरन्तर तथा अनन्य भक्ति, एकान्त स्थानों का आश्रय, सामान्य जन-समूह से विरक्ति; आत्म-साक्षात्कार के महत्त्व को स्वीकार करना, तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज—इन सबको मैं इस प्रकार ज्ञान घोषित करता हूँ, और जो इनके विपरीत है, वह अज्ञान है।
ज्ञान की इस प्रक्रिया को कभी-कभी अल्पबुद्धि मनुष्य कर्म-क्षेत्र की अन्तःक्रिया के रूप में भ्रमवश समझ बैठते हैं। किन्तु वस्तुतः यही ज्ञान की वास्तविक प्रक्रिया है। यदि कोई इस प्रक्रिया को स्वीकार करे, तो परम सत्य के पास पहुँचने की सम्भावना विद्यमान रहती है। यह दस तत्त्वों की अन्तःक्रिया नहीं है, जैसा पहले वर्णित हुआ; यह तो वस्तुतः उससे बाहर निकलने का साधन है। ज्ञान की प्रक्रिया के समस्त वर्णनों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बिन्दु दसवें श्लोक की प्रथम पंक्ति में वर्णित है : ज्ञान की प्रक्रिया भगवान् की अनन्य भक्ति में पर्यवसित होती है। अतः यदि कोई भगवान् की दिव्य सेवा के पास न पहुँचे, अथवा पहुँचने में असमर्थ हो, तो शेष उन्नीस अंगों का कोई विशेष मूल्य नहीं है। किन्तु यदि कोई पूर्ण कृष्णभावनामृत में भक्ति को अपना ले, तो शेष उन्नीस अंग स्वतः ही उसमें विकसित हो जाते हैं। आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार करने का सिद्धान्त, जैसा सातवें श्लोक में उल्लिखित है, अनिवार्य है। उसके लिए भी जो भक्ति को अपनाता है, यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। दिव्य जीवन तब आरम्भ होता है जब कोई प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार करता है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ज्ञान की यह प्रक्रिया ही वास्तविक पथ है। इससे परे की कोई भी कल्पना निरर्थक है।
यहाँ रेखांकित ज्ञान के विषय में, इन अंगों का विश्लेषण इस प्रकार किया जा सकता है : विनम्रता का अर्थ है कि मनुष्य को दूसरों से सम्मानित होने की तृप्ति के लिए उत्सुक नहीं रहना चाहिए। जीवन की भौतिक धारणा हमें दूसरों से सम्मान पाने के लिए अत्यन्त उत्सुक बना देती है, किन्तु पूर्ण ज्ञान में स्थित मनुष्य के दृष्टिकोण से—जो जानता है कि वह यह शरीर नहीं है—इस शरीर से सम्बन्धित कोई भी वस्तु, चाहे सम्मान हो या अपमान, व्यर्थ है। मनुष्य को इस भौतिक छल के पीछे लालायित नहीं रहना चाहिए। लोग अपने धर्म के लिए प्रसिद्ध होने के अत्यन्त उत्सुक रहते हैं, और परिणामस्वरूप कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि धर्म के सिद्धान्तों को समझे बिना ही कोई किसी ऐसे समूह में प्रवेश कर लेता है, जो वस्तुतः धार्मिक सिद्धान्तों का पालन नहीं करता, और फिर अपने को धार्मिक गुरु के रूप में विज्ञापित करना चाहता है। आध्यात्मिक विज्ञान में वास्तविक उन्नति के विषय में, मनुष्य के पास यह देखने की एक कसौटी होनी चाहिए कि वह कितनी दूर तक प्रगति कर रहा है। वह इन अंगों से इसका निर्णय कर सकता है।
अहिंसा का अर्थ सामान्यतः शरीर को न मारना या न नष्ट करना लिया जाता है, किन्तु वस्तुतः अहिंसा का अर्थ है दूसरों को कष्ट में न डालना। सामान्य जन अज्ञान द्वारा जीवन की भौतिक धारणा में फँसे हुए हैं, और वे निरन्तर भौतिक पीड़ाएँ भोगते हैं। अतः जब तक कोई लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान तक ऊपर न उठाए, तब तक वह हिंसा का अभ्यास कर रहा है। मनुष्य को लोगों में वास्तविक ज्ञान वितरित करने का पूरा प्रयत्न करना चाहिए, ताकि वे प्रबुद्ध हो सकें और इस भौतिक बन्धन को छोड़ सकें। यही अहिंसा है।
सहनशीलता का अर्थ है कि मनुष्य को दूसरों से अपमान तथा अनादर सहने का अभ्यस्त होना चाहिए। यदि कोई आध्यात्मिक ज्ञान की उन्नति में संलग्न है, तो दूसरों से इतने अपमान तथा बहुत-सा अनादर मिलेगा। यह अपेक्षित है, क्योंकि भौतिक प्रकृति की रचना ही ऐसी है। प्रह्लाद जैसे बालक तक, जो केवल पाँच वर्ष के होकर आध्यात्मिक ज्ञान की साधना में संलग्न थे, संकट में पड़ गए जब उनके पिता उनकी भक्ति के प्रति विरोधी बन गए। पिता ने उन्हें इतने प्रकारों से मार डालने का प्रयास किया, किन्तु प्रह्लाद ने उसे सहन किया। अतः आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नति करने में अनेक बाधाएँ आ सकती हैं, किन्तु हमें सहनशील रहना चाहिए और दृढ़ संकल्प के साथ अपनी प्रगति जारी रखनी चाहिए।
सरलता का अर्थ है कि कूटनीति के बिना मनुष्य इतना सरल हो कि वह शत्रु के समक्ष भी वास्तविक सत्य को प्रकट कर सके। आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार करने के विषय में, वह अनिवार्य है, क्योंकि प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के उपदेश के बिना मनुष्य आध्यात्मिक विज्ञान में प्रगति नहीं कर सकता। मनुष्य को समस्त विनम्रता के साथ आध्यात्मिक गुरु की शरण में जाना चाहिए और उन्हें समस्त सेवा अर्पित करनी चाहिए, ताकि वे प्रसन्न होकर शिष्य पर अपना आशीर्वाद प्रदान करें। चूँकि प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि हैं, यदि वे अपने शिष्य पर कोई आशीर्वाद प्रदान करें, तो वह शिष्य को विधि-विधानों का पालन किए बिना ही तत्काल उन्नत बना देगा। अथवा, जिसने आरक्षण के बिना आध्यात्मिक गुरु की सेवा की है, उसके लिए विधि-विधान सरल हो जाएँगे।
आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करने के लिए स्वच्छता अनिवार्य है। स्वच्छता दो प्रकार की होती है : बाह्य तथा आन्तरिक। बाह्य स्वच्छता का अर्थ है स्नान करना, किन्तु आन्तरिक स्वच्छता के लिए मनुष्य को सदैव श्रीकृष्ण का चिन्तन करना होता है तथा हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप करना होता है। यह प्रक्रिया मन से अतीत के कर्म की संचित धूलि को स्वच्छ कर देती है।
दृढ़ता का अर्थ है कि मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने के लिए अत्यन्त दृढ़-संकल्प होना चाहिए। ऐसे संकल्प के बिना मनुष्य कोई ठोस प्रगति नहीं कर सकता। और आत्मसंयम का अर्थ है कि मनुष्य को ऐसी कोई वस्तु स्वीकार नहीं करनी चाहिए, जो आध्यात्मिक प्रगति के पथ के लिए हानिकारक हो। मनुष्य को इसका अभ्यस्त हो जाना चाहिए और ऐसी प्रत्येक वस्तु को अस्वीकार कर देना चाहिए, जो आध्यात्मिक प्रगति के पथ के विरुद्ध हो। यही वास्तविक त्याग है। इन्द्रियाँ इतनी प्रबल हैं कि वे सदैव इन्द्रियतृप्ति के लिए उत्सुक रहती हैं। मनुष्य को इन माँगों की पूर्ति नहीं करनी चाहिए, जो आवश्यक नहीं हैं। इन्द्रियों को केवल इतना ही तृप्त करना चाहिए कि शरीर स्वस्थ रहे, ताकि मनुष्य आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करने का अपना कर्तव्य निभा सके। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथा दुर्निवार इन्द्रिय जिह्वा है। यदि कोई जिह्वा पर नियन्त्रण कर सके, तो अन्य इन्द्रियों पर नियन्त्रण करने की पूरी सम्भावना है। जिह्वा का कार्य है स्वाद लेना तथा ध्वनि करना। अतएव, व्यवस्थित नियमन द्वारा जिह्वा को सदैव श्रीकृष्ण को अर्पित अन्न के अवशेषों का स्वाद लेने तथा हरे कृष्ण का जप करने में संलग्न रखना चाहिए। जहाँ तक नेत्रों का प्रश्न है, उन्हें श्रीकृष्ण के सुन्दर रूप के अतिरिक्त कुछ भी देखने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। इससे नेत्रों पर नियन्त्रण होगा। इसी प्रकार, कानों को श्रीकृष्ण के विषय में श्रवण करने में तथा नासिका को श्रीकृष्ण को अर्पित पुष्पों की गन्ध लेने में संलग्न रखना चाहिए। यही भक्ति की प्रक्रिया है, और यहाँ यह समझा जाता है कि भगवद्गीता मात्र भक्ति के विज्ञान का प्रतिपादन कर रही है। भक्ति ही मुख्य तथा एकमात्र लक्ष्य है। गीता पर अबुद्धिमान् टीकाकार पाठक के मन को अन्य विषयों की ओर मोड़ने का प्रयास करते हैं, किन्तु भगवद्गीता में भक्ति के अतिरिक्त कोई अन्य विषय है ही नहीं।
मिथ्या अहंकार का अर्थ है इस शरीर को स्वयं स्वीकार करना। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि वह अपना शरीर नहीं है और आत्मा है, तब वही वास्तविक अहंकार है। अहंकार तो है। मिथ्या अहंकार की निन्दा की जाती है, किन्तु वास्तविक अहंकार की नहीं। वैदिक साहित्य में कहा गया है : अहं ब्रह्मास्मि। मैं ब्रह्म हूँ, मैं आत्मा हूँ। यह “मैं हूँ”, स्व की यह भावना, आत्म-साक्षात्कार की मुक्त अवस्था में भी विद्यमान रहती है। “मैं हूँ” की यह भावना अहंकार है, किन्तु जब “मैं हूँ” की भावना को इस मिथ्या शरीर पर लागू किया जाता है, तब वह मिथ्या अहंकार है। जब स्व की भावना को यथार्थ पर लागू किया जाता है, तब वह वास्तविक अहंकार है। कुछ दार्शनिक हैं जो कहते हैं कि हमें अपना अहंकार त्याग देना चाहिए, किन्तु हम अपना अहंकार त्याग नहीं सकते, क्योंकि अहंकार का अर्थ है पहचान। हमें, निःसन्देह, शरीर के साथ मिथ्या तादात्म्य का त्याग करना चाहिए।
मनुष्य को जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग को स्वीकार करने के दुःख को समझने का प्रयत्न करना चाहिए। विभिन्न वैदिक ग्रन्थों में जन्म के वर्णन हैं। श्रीमद्भागवत में अजन्मे का संसार, माता के गर्भ में शिशु का निवास, उसका कष्ट आदि सब अत्यन्त सजीव रूप से वर्णित हैं। यह भली-भाँति समझ लेना चाहिए कि जन्म दुःखमय है। चूँकि हम यह भूल जाते हैं कि माता के गर्भ में हमने कितना दुःख भोगा, इसलिए हम जन्म-मृत्यु की पुनरावृत्ति का कोई समाधान नहीं करते। इसी प्रकार मृत्यु के समय भी सब प्रकार के कष्ट होते हैं, और उनका भी उल्लेख प्रामाणिक शास्त्रों में हुआ है। इन पर विचार किया जाना चाहिए। और जहाँ तक रोग तथा वृद्धावस्था का प्रश्न है, प्रत्येक व्यक्ति व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करता है। कोई भी रोगी नहीं होना चाहता, और कोई भी वृद्ध नहीं होना चाहता, किन्तु इनसे बचा नहीं जा सकता। जब तक हमारा इस भौतिक जीवन के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण न हो, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दुःखों पर विचार करते हुए, तब तक आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करने का हमारे लिए कोई प्रेरक नहीं रहता।
जहाँ तक सन्तान, पत्नी तथा घर से अनासक्ति का प्रश्न है, इसका यह अर्थ नहीं कि मनुष्य के मन में इनके प्रति कोई भाव न हो। ये स्नेह की स्वाभाविक वस्तुएँ हैं, किन्तु जब ये आध्यात्मिक प्रगति के अनुकूल न हों, तब मनुष्य को इनके प्रति आसक्त नहीं होना चाहिए। घर को सुखद बनाने की सर्वोत्तम प्रक्रिया कृष्णभावनामृत है। यदि कोई पूर्ण कृष्णभावनामृत में हो, तो वह अपने घर को अत्यन्त सुखी बना सकता है, क्योंकि कृष्णभावनामृत की यह प्रक्रिया अत्यन्त सरल है। मनुष्य को केवल हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप करना है, श्रीकृष्ण को अर्पित अन्न के अवशेषों को स्वीकार करना है, भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत जैसे ग्रन्थों पर कुछ चर्चा करनी है, और स्वयं को विग्रह-आराधना में संलग्न करना है। ये चार बातें मनुष्य को सुखी बना देंगी। मनुष्य को अपने परिवार के सदस्यों को इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिए। परिवार के सदस्य प्रातः तथा सायं बैठकर एक साथ हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप कर सकते हैं। यदि कोई इन चार सिद्धान्तों का पालन करते हुए कृष्णभावनामृत विकसित करने के लिए अपने पारिवारिक जीवन को इस प्रकार ढाल सके, तो पारिवारिक जीवन से संन्यस्त जीवन में जाने की कोई आवश्यकता नहीं। किन्तु यदि यह अनुकूल न हो, आध्यात्मिक उन्नति के लिए हितकर न हो, तो पारिवारिक जीवन का परित्याग कर देना चाहिए। मनुष्य को श्रीकृष्ण का साक्षात्कार करने या उनकी सेवा करने के लिए सब कुछ न्योछावर कर देना चाहिए, ठीक जैसे अर्जुन ने किया। अर्जुन अपने परिवार के सदस्यों को मारना नहीं चाहते थे, किन्तु जब उन्होंने यह समझ लिया कि ये परिवार के सदस्य उनके श्रीकृष्ण-साक्षात्कार में बाधक हैं, तब उन्होंने श्रीकृष्ण के उपदेश को स्वीकार किया और युद्ध करके उनका वध किया। समस्त परिस्थितियों में मनुष्य को पारिवारिक जीवन के सुख-दुःख से अनासक्त रहना चाहिए, क्योंकि इस संसार में कोई भी न तो पूर्णतः सुखी हो सकता है और न पूर्णतः दुःखी। सुख तथा दुःख भौतिक जीवन के सहवर्ती घटक हैं। मनुष्य को सहन करना सीखना चाहिए, जैसा भगवद्गीता में परामर्श दिया गया है। मनुष्य सुख तथा दुःख के आने-जाने पर कभी प्रतिबन्ध नहीं लगा सकता, अतः मनुष्य को जीवन की भौतिकतावादी रीति से अनासक्त रहना चाहिए और दोनों ही स्थितियों में स्वतः समभाव में स्थित रहना चाहिए। सामान्यतः, जब हमें कोई वांछित वस्तु मिलती है, तब हम अत्यन्त सुखी हो जाते हैं, और जब हमें कोई अवांछित वस्तु मिलती है, तब हम दुःखी हो जाते हैं। किन्तु यदि हम वस्तुतः आध्यात्मिक स्थिति में हों, तो ये वस्तुएँ हमें विचलित नहीं करेंगी। उस अवस्था तक पहुँचने के लिए हमें अखण्ड भक्ति का अभ्यास करना होता है; श्रीकृष्ण के प्रति विचलन रहित भक्ति का अर्थ है स्वयं को भक्ति की नौ प्रक्रियाओं में संलग्न करना—श्रवण, कीर्तन, आराधना, सम्मान अर्पित करना आदि, जैसा नवें अध्याय के अन्तिम श्लोक में वर्णित है। उस प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। स्वभावतः, जब कोई आध्यात्मिक जीवन-रीति के अनुकूल बन जाता है, तब वह भौतिकतावादी मनुष्यों के साथ घुलना-मिलना नहीं चाहेगा। यह उसके स्वभाव के विरुद्ध होगा। मनुष्य यह देखकर अपनी परीक्षा कर सकता है कि वह अवांछित संसर्ग के बिना एकान्त स्थान में रहने की ओर कितना प्रवृत्त है।
स्वभावतः भक्त को अनावश्यक खेल-कूद या चलचित्र देखने अथवा किसी सामाजिक समारोह का आनन्द लेने में कोई रुचि नहीं होती, क्योंकि वह समझता है कि ये मात्र समय का अपव्यय हैं। अनेक शोध-विद्वान् तथा दार्शनिक हैं, जो काम-जीवन या किसी अन्य विषय का अध्ययन करते हैं, किन्तु भगवद्गीता के अनुसार ऐसे शोध-कार्य तथा दार्शनिक कल्पना का कोई मूल्य नहीं है। वह कमोबेश निरर्थक है। भगवद्गीता के अनुसार, मनुष्य को दार्शनिक विवेक द्वारा आत्मा की प्रकृति पर शोध करना चाहिए। मनुष्य को यह समझने के लिए शोध करना चाहिए कि स्व का सम्बन्ध किस वस्तु से है। यहाँ इसी की अनुशंसा की जाती है।
जहाँ तक आत्म-साक्षात्कार का प्रश्न है, यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भक्तियोग विशेष रूप से व्यावहारिक है। ज्यों ही भक्ति का प्रश्न उठता है, मनुष्य को परमात्मा तथा व्यष्टि आत्मा के बीच के सम्बन्ध पर विचार करना होता है। व्यष्टि आत्मा तथा परमात्मा एक नहीं हो सकते, कम-से-कम भक्ति-धारणा में, अर्थात् जीवन की भक्तिमय धारणा में तो नहीं। परम आत्मा के प्रति व्यष्टि आत्मा की यह सेवा नित्य है, नित्यम्, जैसा स्पष्ट रूप से कहा गया है। अतः भक्ति या भगवद्भक्ति नित्य है। मनुष्य को उस दार्शनिक प्रतीति में स्थित होना चाहिए, अन्यथा यह मात्र समय का अपव्यय, अज्ञान है।
श्रीमद्भागवत में इसे समझाया गया है; वदन्ति तत् तत्त्व-विदस् तत्त्वं यज् ज्ञानम् अद्वयम्। “जो वस्तुतः परम सत्य के ज्ञाता हैं, वे जानते हैं कि स्व का साक्षात्कार तीन भिन्न-भिन्न चरणों में होता है—ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् के रूप में।” (भाग. 1.2.11) परम सत्य के साक्षात्कार में भगवान् ही अन्तिम शब्द हैं; अतः मनुष्य को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझने के उस स्तर तक पहुँचना चाहिए और इस प्रकार भगवान् की भक्ति में संलग्न होना चाहिए। यही ज्ञान की पूर्णता है।
विनम्रता के अभ्यास से आरम्भ करके परम सत्य अर्थात् परम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साक्षात्कार के बिन्दु तक, यह प्रक्रिया ठीक एक सीढ़ी के समान है, जो भूमि-तल से आरम्भ होकर ऊपरी तल तक जाती है। अब इस सीढ़ी पर इतने लोग हैं, जो प्रथम तल, द्वितीय या तृतीय तल आदि तक पहुँच चुके हैं, किन्तु जब तक कोई ऊपरी तल तक नहीं पहुँचता, जो श्रीकृष्ण को समझना है, तब तक वह ज्ञान की निम्न अवस्था में है। यदि कोई भगवान् से स्पर्धा करना चाहे और साथ ही आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नति करना चाहे, तो वह कुण्ठित हो जाएगा। यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि विनम्रता के बिना ज्ञान हानिकारक है। स्वयं को भगवान् मानना सर्वाधिक अहंकारग्रस्त है। यद्यपि जीव सदैव भौतिक प्रकृति के कठोर नियमों से प्रताड़ित होता रहता है, फिर भी वह अज्ञानवश सोचता है, “मैं भगवान् हूँ।” मनुष्य को विनम्र होना चाहिए और जानना चाहिए कि वह परमेश्वर के अधीनस्थ है। परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह के कारण मनुष्य भौतिक प्रकृति के अधीनस्थ हो जाता है। मनुष्य को इस सत्य को जानना तथा इसके प्रति आश्वस्त होना चाहिए।