हि

अध्याय 13 · 5 / 29

13.6-7

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ६ ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ७ ॥

महा-भूतानि—पंचमहाभूत; अहङ्कारः—मिथ्या अहंकार; बुद्धिः—बुद्धि; अव्यक्तम्—अव्यक्त; एव—निश्चय ही; च—भी; इन्द्रियाणि—इन्द्रियाँ; दश एकम्—ग्यारह; च—भी; पञ्च—पाँच; च—भी; इन्द्रिय-गोचराः—इन्द्रियों के विषय; इच्छा—इच्छा; द्वेषः—घृणा; सुखम्—सुख; दुःखम्—दुःख; सङ्घातः—समूह; चेतना—जीवन-लक्षण; धृतिः—धैर्य; एतत्—यह सब; क्षेत्रम्—कर्म का क्षेत्र; समासेन—संक्षेप में; स-विकारम्—अन्तःक्रिया सहित; उदाहृतम्—उदाहृत।

पंचमहाभूत, मिथ्या अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त, दस इन्द्रियाँ, मन, पाँच इन्द्रिय-विषय, इच्छा, घृणा, सुख, दुःख, समूह, जीवन-लक्षण तथा धैर्य—इन सबको संक्षेप में कर्म-क्षेत्र तथा उसकी अन्तःक्रियाएँ माना जाता है।

महान् ऋषियों के समस्त प्रामाणिक कथनों, वैदिक स्तोत्रों तथा वेदान्त-सूत्र के सूत्रों के अनुसार, इस जगत् के घटक पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश हैं। ये पंचमहाभूत (महाभूत) हैं। तत्पश्चात् मिथ्या अहंकार, बुद्धि तथा प्रकृति के तीन गुणों की अव्यक्त अवस्था है। तत्पश्चात् ज्ञान-अर्जन के लिए पाँच इन्द्रियाँ हैं : नेत्र, कान, नासिका, जिह्वा तथा त्वचा। तत्पश्चात् पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं : वाणी, पैर, हाथ, गुदा तथा जननेन्द्रिय। तत्पश्चात् इन्द्रियों से ऊपर मन है, जो भीतर रहता है और जिसे भीतरी इन्द्रिय कहा जा सकता है। अतएव, मन सहित कुल मिलाकर ग्यारह इन्द्रियाँ हैं। तत्पश्चात् इन्द्रियों के पाँच विषय हैं : गन्ध, रस, ताप, स्पर्श तथा शब्द। अब इन चौबीस तत्त्वों का समूह कर्म-क्षेत्र कहलाता है। यदि मनुष्य इन चौबीस विषयों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करे, तो वह कर्म-क्षेत्र को भली-भाँति समझ सकता है। तत्पश्चात् इच्छा, घृणा, सुख तथा दुःख हैं, जो अन्तःक्रियाएँ हैं, स्थूल शरीर में पंचमहाभूत के प्रतिनिधि हैं। चेतना तथा धैर्य द्वारा निरूपित जीवन-लक्षण सूक्ष्म शरीर—मन, अहंकार तथा बुद्धि—के प्रकटीकरण हैं। ये सूक्ष्म तत्त्व कर्म-क्षेत्र के अन्तर्गत सम्मिलित हैं।

पंचमहाभूत सूक्ष्म मिथ्या अहंकार के स्थूल प्रतिनिधि हैं। वे भौतिक धारणा में प्रतिनिधि हैं। चेतना बुद्धि द्वारा निरूपित होती है, जिसकी अव्यक्त अवस्था भौतिक प्रकृति के तीन गुण हैं। भौतिक प्रकृति के अव्यक्त तीन गुण प्रधान कहलाते हैं।

जो व्यक्ति चौबीस तत्त्वों को उनकी अन्तःक्रियाओं सहित विस्तार से जानना चाहता है, उसे इस दर्शन का अधिक विस्तार से अध्ययन करना चाहिए। भगवद्गीता में केवल एक सार-संक्षेप दिया गया है।

शरीर इन समस्त घटकों का प्रतिनिधित्व है, और शरीर के परिवर्तन हैं, जो संख्या में छह हैं : शरीर जन्म लेता है, यह बढ़ता है, यह स्थिर रहता है, यह उपजात उत्पन्न करता है, फिर क्षीण होने लगता है, और अन्तिम अवस्था में लुप्त हो जाता है। इसी कारण क्षेत्र एक अनित्य भौतिक वस्तु है। तथापि, क्षेत्रज्ञ अर्थात् क्षेत्र का ज्ञाता, उसका स्वामी, भिन्न है।