हि

अध्याय 14 · 10 / 24

14.10

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥

रजः—रजोगुण; तमः—तमोगुण; च—भी; अभिभूय—अभिभूत करके; सत्त्वम्—सत्त्वगुण; भवति—प्रमुख होता है; भारत—हे भरतपुत्र; रजः—रजोगुण; सत्त्वम्—सत्त्वगुण; तमः—तमोगुण; च—भी; एव—उसी प्रकार; तमः—तमोगुण; सत्त्वम्—सत्त्वगुण; रजः—रजोगुण; तथा—इसी प्रकार।

हे भरतपुत्र, कभी-कभी रजोगुण सत्त्वगुण को परास्त करके प्रमुख हो जाता है। और कभी सत्त्वगुण रजोगुण को परास्त करता है, तथा कभी तमोगुण सत्त्व और रज को परास्त करता है। इस प्रकार सर्वोच्चता के लिए सदा स्पर्धा चलती रहती है।

जब रजोगुण प्रमुख होता है, तब सत्त्व और तमोगुण परास्त हो जाते हैं। जब सत्त्वगुण प्रमुख होता है, तब रज और तमोगुण परास्त हो जाते हैं। और जब तमोगुण प्रमुख होता है, तब रज और सत्त्वगुण परास्त हो जाते हैं। यह स्पर्धा सदा चलती रहती है। अतः जो वास्तव में कृष्णभावनामृत में उन्नति करने हेतु तत्पर है, उसे इन तीनों गुणों को लाँघना पड़ता है। प्रकृति के किसी निश्चित गुण की प्रमुखता मनुष्य के व्यवहार में, उसके कर्मों में, भोजन आदि में प्रकट होती है। यह सब आगे के अध्यायों में समझाया जाएगा। किन्तु यदि कोई चाहे, तो वह अभ्यास द्वारा सत्त्वगुण का विकास कर सकता है और इस प्रकार रज और तमोगुणों को परास्त कर सकता है। इसी प्रकार मनुष्य रजोगुण का विकास करके सत्त्व और तमोगुण को परास्त कर सकता है। अथवा मनुष्य तमोगुण का विकास करके सत्त्व और रजोगुण को परास्त कर सकता है। यद्यपि भौतिक प्रकृति के ये तीन गुण हैं, यदि मनुष्य दृढ़निश्चयी हो, तो वह सत्त्वगुण से अनुगृहीत हो सकता है, और सत्त्वगुण को लाँघकर वह शुद्ध सत्त्व में स्थित हो सकता है, जिसे वासुदेव अवस्था कहते हैं, वह अवस्था जिसमें मनुष्य ईश्वर के विज्ञान को समझ सकता है। विशिष्ट क्रियाओं के प्राकट्य से यह समझा जा सकता है कि मनुष्य प्रकृति के किस गुण में स्थित है।