हि

अध्याय 14 · 9 / 24

14.9

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥ ९ ॥

सत्त्वम्—सत्त्वगुण; सुखे—सुख में; सञ्जयति—संलग्न करता है; रजः—रजोगुण; कर्मणि—कर्म के फलों में; भारत—हे भरतपुत्र; ज्ञानम्—ज्ञान को; आवृत्य—आच्छादित करके; तु—किन्तु; तमः—तमोगुण; प्रमादे—उन्मत्तता में; सञ्जयति—संलग्न करता है; उत—कहा जाता है।

सत्त्वगुण मनुष्य को सुख में बाँधता है, रजोगुण उसे कर्म के फलों में बाँधता है, और तमोगुण उसे उन्मत्तता में बाँधता है।

सत्त्वगुण में स्थित व्यक्ति अपने कार्य अथवा बौद्धिक प्रयास से सन्तुष्ट रहता है, ठीक जैसे कोई दार्शनिक, वैज्ञानिक अथवा शिक्षक ज्ञान के किसी विशिष्ट क्षेत्र में संलग्न रह सकता है और उसी प्रकार सन्तुष्ट रह सकता है। रज और सत्त्व गुणों में स्थित मनुष्य सकाम कर्म में संलग्न रह सकता है; वह जितना सम्भव हो उतना संचित करता है और अच्छे कार्यों में व्यय करता है। कभी-कभी वह चिकित्सालय खोलने का, दानशील संस्थाओं को देने का प्रयत्न करता है। ये रजोगुण में स्थित व्यक्ति के लक्षण हैं। और तमोगुण ज्ञान को आच्छादित कर देता है। तमोगुण में मनुष्य जो भी करता है, वह न उसके लिए हितकर होता है, न किसी अन्य के लिए।