अध्याय 14 · 12 / 24
14.12
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥
लोभः—लोभ; प्रवृत्तिः—लालसा; आरम्भः—प्रयास; कर्मणाम्—कर्मों का; अशमः—अनियन्त्रित; स्पृहा—इच्छा; रजसि—रजोगुण में; एतानि—ये सब; जायन्ते—विकसित होते हैं; विवृद्धे—जब अधिकता हो; भरतर्षभ—हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ।
हे भरतश्रेष्ठ, जब रजोगुण में वृद्धि होती है, तब अत्यधिक आसक्ति, अनियन्त्रित इच्छा, लालसा और तीव्र प्रयास के लक्षण विकसित होते हैं।
रजोगुण में स्थित व्यक्ति उस स्थिति से कभी सन्तुष्ट नहीं होता जो उसने पहले से ही प्राप्त कर ली है; वह अपनी स्थिति को बढ़ाने की लालसा करता है। यदि वह कोई आवासीय भवन बनाना चाहता है, तो वह एक प्रासाद-तुल्य घर पाने का यथासम्भव प्रयास करता है, मानो वह उस घर में नित्य निवास कर सकेगा। और उसमें इन्द्रियतृप्ति की महान लालसा विकसित होती है। इन्द्रियतृप्ति का कोई अन्त नहीं होता। वह सदा अपने परिवार के साथ और अपने घर में रहना चाहता है और इन्द्रियतृप्ति की प्रक्रिया को जारी रखना चाहता है। इसका कोई विराम नहीं है। इन समस्त लक्षणों को रजोगुण की विशेषता के रूप में समझना चाहिए।