अध्याय 14 · 13 / 24
14.13
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥
अप्रकाशः—अन्धकार; अप्रवृत्तिः—निष्क्रियता; च—और; प्रमादः—उन्मत्तता; मोहः—भ्रम; एव—निश्चय ही; च—भी; तमसि—तमोगुण का; एतानि—ये; जायन्ते—प्रकट होते हैं; विवृद्धे—विकसित होने पर; कुरु-नन्दन—हे कुरुनन्दन।
हे कुरुनन्दन, जब तमोगुण में वृद्धि होती है, तब उन्मत्तता, भ्रम, जड़ता और अन्धकार प्रकट होते हैं।
जब कोई प्रकाश नहीं होता, तब ज्ञान अनुपस्थित होता है। तमोगुण में स्थित व्यक्ति किसी नियामक सिद्धान्त से कर्म नहीं करता; वह बिना किसी प्रयोजन के मनमाने ढंग से कर्म करना चाहता है। यद्यपि उसमें कर्म करने की क्षमता है, तथापि वह कोई प्रयास नहीं करता। इसे भ्रम कहते हैं। यद्यपि चेतना विद्यमान है, तथापि जीवन निष्क्रिय है। ये तमोगुण में स्थित व्यक्ति के लक्षण हैं।