अध्याय 14 · 18 / 24
14.18
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥
ūrdhvam—ऊपर की ओर; gacchanti—जाते हैं; sattva-sthāḥ—जो सत्त्वगुण में स्थित है; madhye—मध्य में; tiṣṭhanti—निवास करते हैं; rājasāḥ—जो रजोगुण में स्थित हैं; jaghanya—गर्हित; guṇa—गुण; vṛtti-sthāḥ—जीविका; adhaḥ—नीचे; gacchanti—जाते हैं; tāmasāḥ—तमोगुण में स्थित व्यक्ति।
सत्त्वगुण में स्थित व्यक्ति क्रमशः उच्चतर लोकों की ओर ऊपर जाते हैं; रजोगुण में स्थित व्यक्ति पार्थिव लोकों पर निवास करते हैं; और तमोगुण में स्थित व्यक्ति नारकीय लोकों की ओर नीचे जाते हैं।
इस श्लोक में प्रकृति के तीनों गुणों में किए गए कर्मों के परिणाम अधिक स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किए गए हैं। एक उच्चतर लोक-मण्डल है, जो स्वर्गीय लोकों से बना है, जहाँ प्रत्येक प्राणी अत्यधिक उन्नत है। सत्त्वगुण के विकास की मात्रा के अनुसार जीव इस मण्डल के विभिन्न लोकों में स्थानान्तरित किया जा सकता है। सर्वोच्च लोक सत्यलोक अथवा ब्रह्मलोक है, जहाँ इस ब्रह्माण्ड के प्रमुख पुरुष भगवान् ब्रह्मा निवास करते हैं। हम पहले ही देख चुके हैं कि ब्रह्मलोक में जीवन की अद्भुत अवस्था की गणना हम कठिनता से ही कर सकते हैं, किन्तु जीवन की सर्वोच्च अवस्था, अर्थात् सत्त्वगुण, हमें इस अवस्था तक पहुँचा सकती है।
रजोगुण मिश्रित होता है। यह मध्य में, सत्त्वगुण और तमोगुण के बीच स्थित होता है। कोई व्यक्ति सदा शुद्ध नहीं रहता, किन्तु यदि वह विशुद्ध रूप से रजोगुण में भी स्थित हो, तो वह इसी पृथ्वी पर राजा या धनी व्यक्ति के रूप में ही बना रहेगा। परन्तु चूँकि मिश्रण होते रहते हैं, अतः वह नीचे भी जा सकता है। इस पृथ्वी पर रजोगुण या तमोगुण में स्थित लोग यन्त्र के बल पर उच्चतर लोकों तक बलपूर्वक नहीं पहुँच सकते। रजोगुण में अगले जीवन में उन्मत्त हो जाने की सम्भावना भी रहती है।
सबसे निम्न गुण, अर्थात् तमोगुण, यहाँ गर्हित कहा गया है। अज्ञान के विकास का परिणाम अत्यन्त, अत्यन्त जोखिमपूर्ण है। यह भौतिक प्रकृति का सबसे निम्न गुण है। मनुष्य के स्तर से नीचे जीवन की अस्सी लाख योनियाँ हैं — पक्षी, पशु, सरीसृप, वृक्ष आदि — और तमोगुण के विकास के अनुसार लोगों को इन गर्हित अवस्थाओं में नीचे लाया जाता है। यहाँ tāmasāḥ शब्द अत्यन्त सार्थक है। tāmasāḥ उन व्यक्तियों को इंगित करता है जो उच्चतर गुण की ओर ऊपर उठे बिना निरन्तर तमोगुण में ही बने रहते हैं। उनका भविष्य अत्यन्त अन्धकारमय है।
तमोगुण और रजोगुण में स्थित मनुष्यों के लिए सत्त्वगुण तक उन्नत होने का अवसर है, और वह प्रणाली कृष्णभावनामृत कहलाती है। किन्तु जो इस अवसर से लाभ नहीं उठाता, वह निश्चय ही निम्न गुणों में ही बना रहेगा।