हि

अध्याय 14 · 19 / 24

14.19

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥

na—कभी नहीं; anyam—से भिन्न; guṇebhyaḥ—गुणों से; kartāram—कर्ता; yadā—जब; draṣṭā anupaśyati—जो भली-भाँति देखता है; guṇebhyaḥ ca—प्रकृति के गुणों से; param—दिव्य; vetti—जानता है; mat-bhāvam—मेरी आध्यात्मिक प्रकृति; saḥ—वह; adhigacchati—उन्नत होता है।

जब तुम यह देख लेते हो कि समस्त कर्मों में इन प्रकृति के गुणों से परे और कुछ नहीं है तथा परमेश्वर इन समस्त गुणों के प्रति दिव्य हैं, तब तुम मेरी आध्यात्मिक प्रकृति को जान सकते हो।

उपयुक्त आत्माओं से सीखकर भौतिक प्रकृति के गुणों के समस्त कर्मों को भली-भाँति समझ लेने मात्र से ही मनुष्य उनसे परे जा सकता है। वास्तविक आध्यात्मिक गुरु श्रीकृष्ण हैं, और वे अर्जुन को यह आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान कर रहे हैं। इसी प्रकार, प्रकृति के गुणों के सन्दर्भ में कर्मों के इस विज्ञान को उन्हीं व्यक्तियों से सीखना होता है जो पूर्णतः कृष्णभावनामृत में स्थित हैं। अन्यथा मनुष्य का जीवन दिशाहीन हो जाएगा। प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के निर्देश से जीव अपनी आध्यात्मिक स्थिति, अपने भौतिक शरीर, अपनी इन्द्रियों, अपने बँधने की रीति, तथा भौतिक प्रकृति के गुणों के वशीभूत होने की रीति को जान सकता है। इन गुणों की पकड़ में रहता हुआ वह असहाय है, किन्तु जब वह अपनी वास्तविक स्थिति को देख लेता है, तब वह आध्यात्मिक जीवन का अवसर पाकर दिव्य स्तर तक पहुँच सकता है। वस्तुतः जीव विभिन्न कर्मों का कर्ता नहीं है। उसे कर्म करने के लिए विवश किया जाता है, क्योंकि वह एक विशेष प्रकार के शरीर में स्थित है, जो भौतिक प्रकृति के किसी विशेष गुण द्वारा संचालित होता है। जब तक मनुष्य को आध्यात्मिक अधिकारी की सहायता प्राप्त न हो, तब तक वह यह नहीं समझ सकता कि वह वास्तव में किस स्थिति में स्थित है। प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की संगति से वह अपनी वास्तविक स्थिति देख सकता है, और ऐसी समझ से वह पूर्ण कृष्णभावनामृत में दृढ़ हो सकता है। कृष्णभावनामृत में स्थित मनुष्य भौतिक प्रकृति के गुणों के वशीभूत नहीं होता। सातवें अध्याय में पहले ही कहा जा चुका है कि जिसने श्रीकृष्ण की शरण ले ली है, वह भौतिक प्रकृति के कर्मों से मुक्त हो जाता है। अतएव जो वस्तुओं को उनके यथार्थ रूप में देखने में समर्थ है, उसके लिए भौतिक प्रकृति का प्रभाव क्रमशः समाप्त हो जाता है।