हि

अध्याय 14 · 20 / 24

14.20

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥

guṇān—गुण; etān—ये समस्त; atītya—पार करके; trīn—तीन; dehī—देहधारी; deha—शरीर से; samudbhavān—उत्पन्न; janma—जन्म; mṛtyu—मृत्यु; jarā—जरा; duḥkhaiḥ—दुःखों से; vimuktaḥ—मुक्त होकर; amṛtam—अमृत; aśnute—भोगता है।

जब देहधारी जीव इन तीनों गुणों को पार करने में समर्थ हो जाता है, तब वह जन्म, मृत्यु, जरा तथा उनके दुःखों से मुक्त हो सकता है और इसी जीवन में अमृत का भोग कर सकता है।

इस श्लोक में यह बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य इसी शरीर में रहते हुए पूर्ण कृष्णभावनामृत में दिव्य स्थिति में रह सकता है। संस्कृत शब्द dehī का अर्थ है देहधारी। यद्यपि मनुष्य इस भौतिक शरीर के भीतर है, तो भी आध्यात्मिक ज्ञान में अपनी उन्नति के द्वारा वह प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त हो सकता है। वह इसी शरीर में रहते हुए आध्यात्मिक जीवन के सुख का भोग कर सकता है, क्योंकि इस शरीर को त्यागने के पश्चात् वह निश्चय ही आध्यात्मिक आकाश को जाएगा। किन्तु इसी शरीर में रहते हुए भी वह आध्यात्मिक सुख का भोग कर सकता है। दूसरे शब्दों में, कृष्णभावनामृत में भक्ति ही इस भौतिक बन्धन से मुक्ति का चिह्न है, और इसे अठारहवें अध्याय में समझाया जाएगा। जब मनुष्य भौतिक प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है, तब वह भक्ति में प्रवृत्त होता है।