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अध्याय 14 · 24 / 24

14.27

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥

brahmaṇaḥ—निराकार ब्रह्मज्योति का; hi—निश्चय ही; pratiṣṭhā—आधार; aham—मैं हूँ; amṛtasya—अविनाशी का; avyayasya—अमर; ca—भी; śāśvatasya—शाश्वत का; ca—और; dharmasya—स्वरूपगत स्थिति का; sukhasya—सुख का; aikāntikasya—परम; ca—भी।

और मैं ही निराकार ब्रह्म का आधार हूँ, जो परम सुख की स्वरूपगत स्थिति है, और जो अमर, अविनाशी तथा शाश्वत है।

ब्रह्म का स्वरूप अमरता, अविनाशिता, शाश्वतता तथा सुख है। ब्रह्म दिव्य अनुभूति का आरम्भ है। परमात्मा, अर्थात् अन्तर्यामी, मध्य है, अर्थात् दिव्य अनुभूति का दूसरा सोपान है, और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् परम सत्य की अन्तिम अनुभूति हैं। अतएव परमात्मा और निराकार ब्रह्म — दोनों ही परम पुरुष के भीतर हैं। सातवें अध्याय में समझाया गया है कि भौतिक प्रकृति परमेश्वर की अपरा शक्ति का प्रकटीकरण है। भगवान् अपरा भौतिक प्रकृति को परा प्रकृति के अंशों से गर्भित करते हैं, और यही भौतिक प्रकृति में आध्यात्मिक स्पर्श है। जब इस भौतिक प्रकृति से बद्ध जीव आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन आरम्भ करता है, तब वह भौतिक अस्तित्व की स्थिति से स्वयं को उन्नत करता है और क्रमशः परम के ब्रह्म-बोध तक ऊपर उठता है। जीवन के इस ब्रह्म-बोध की प्राप्ति आत्म-साक्षात्कार का प्रथम सोपान है। इस अवस्था में ब्रह्म-अनुभूति प्राप्त व्यक्ति भौतिक स्थिति के प्रति दिव्य होता है, किन्तु वह वास्तव में ब्रह्म-अनुभूति में पूर्ण नहीं होता। यदि वह चाहे, तो वह ब्रह्म-स्थिति में बना रह सकता है और तत्पश्चात् क्रमशः परमात्मा-अनुभूति तक तथा फिर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की अनुभूति तक ऊपर उठ सकता है। वैदिक साहित्य में इसके अनेक उदाहरण हैं। चार कुमार सर्वप्रथम सत्य के निराकार ब्रह्म-बोध में स्थित थे, किन्तु तत्पश्चात् वे क्रमशः भक्ति के स्तर तक ऊपर उठे। जो ब्रह्म के निराकार बोध से ऊपर स्वयं को उन्नत नहीं कर पाता, उसके पतित होने का जोखिम रहता है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि यद्यपि कोई व्यक्ति निराकार ब्रह्म की अवस्था तक उठ सकता है, किन्तु आगे बढ़े बिना, परम पुरुष की कोई जानकारी न होने पर, उसकी बुद्धि पूर्णतः स्वच्छ नहीं होती। अतएव, ब्रह्म-स्तर तक उठाए जाने पर भी, यदि कोई भगवान् की भक्ति में संलग्न न हो, तो उसके पतित होने की सम्भावना रहती है। वैदिक भाषा में यह भी कहा गया है: raso vai saḥ; rasaṁ hy evāyaṁ labdhvānandī bhavati। “जब मनुष्य आनन्द के आगार, श्रीकृष्ण, अर्थात् भगवान् को समझ लेता है, तब वह वास्तव में दिव्य रूप से आनन्दमय हो जाता है।” परमेश्वर छह ऐश्वर्यों से परिपूर्ण हैं, और जब कोई भक्त उनके समीप पहुँचता है, तब इन छह ऐश्वर्यों का आदान-प्रदान होता है। राजा का सेवक राजा के साथ लगभग समान स्तर पर भोग करता है। और इस प्रकार शाश्वत सुख, अविनाशी सुख तथा शाश्वत जीवन भक्ति के साथ रहते हैं। अतएव ब्रह्म, अथवा शाश्वतता, अथवा अविनाशिता की अनुभूति भक्ति में सम्मिलित है। यह उस व्यक्ति को पहले से ही प्राप्त है जो भक्ति में संलग्न है।

यद्यपि जीव स्वभाव से ब्रह्म है, तो भी उसमें भौतिक जगत् पर प्रभुत्व जमाने की इच्छा रहती है, और इसी के कारण वह पतित होता है। अपनी स्वरूपगत स्थिति में जीव भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से ऊपर है, किन्तु भौतिक प्रकृति की संगति उसे भौतिक प्रकृति के विभिन्न गुणों — सत्त्व, रजस् तथा तमस् — में फँसा देती है। इन तीनों गुणों की संगति के कारण उसमें भौतिक जगत् पर प्रभुत्व जमाने की इच्छा रहती है। पूर्ण कृष्णभावनामृत में भक्ति में संलग्न होकर वह तत्काल ही दिव्य स्थिति में स्थित हो जाता है, और भौतिक प्रकृति पर नियन्त्रण की उसकी अनुचित इच्छा दूर हो जाती है। अतएव श्रवण, कीर्तन, स्मरण से आरम्भ होने वाली भक्ति की प्रक्रिया — भक्ति की अनुभूति हेतु विहित नौ विधियाँ — का अभ्यास भक्तों की संगति में करना चाहिए। ऐसी संगति से, आध्यात्मिक गुरु के प्रभाव से, मनुष्य की प्रभुत्व जमाने की भौतिक इच्छा क्रमशः दूर हो जाती है, और वह भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में दृढ़तापूर्वक स्थित हो जाता है। यह विधि इस अध्याय के बाईसवें श्लोक से अन्तिम श्लोक तक विहित है। भगवान् की भक्ति अत्यन्त सरल है: मनुष्य को सदा भगवान् की सेवा में संलग्न रहना चाहिए, श्रीविग्रह को अर्पित खाद्य पदार्थों के अवशेष ग्रहण करने चाहिए, भगवान् के चरणकमलों पर अर्पित पुष्पों को सूँघना चाहिए, उन स्थानों को देखना चाहिए जहाँ भगवान् ने अपनी दिव्य लीलाएँ कीं, भगवान् के विभिन्न कर्मों के विषय में, अपने भक्तों के साथ उनके प्रेम-विनिमय के विषय में पढ़ना चाहिए, सदा दिव्य ध्वनि हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का कीर्तन करना चाहिए, तथा भगवान् और उनके भक्तों के आविर्भाव और तिरोभाव की स्मृति में मनाए जाने वाले उपवास के दिनों का पालन करना चाहिए। ऐसी विधि का अनुसरण करके मनुष्य समस्त भौतिक कर्मों से पूर्णतः विरक्त हो जाता है। जो इस प्रकार स्वयं को ब्रह्मज्योति में स्थित कर लेता है, वह गुण की दृष्टि से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के समान है।

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय, “भौतिक प्रकृति के तीन गुण” विषयक, भक्तिवेदान्त तात्पर्यों की समाप्ति होती है।