हि

अध्याय 15 · 1 / 19

15.1

श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥

श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; ऊर्ध्व-मूलम्—मूल ऊपर की ओर; अधः—नीचे की ओर; शाखम्—शाखाएँ; अश्वत्थम्—वटवृक्ष; प्राहुः—कहा गया है; अव्ययम्—नित्य; छन्दांसि—वैदिक स्तोत्र; यस्य—जिसके; पर्णानि—पत्ते; यः—जो कोई; तम्—उसको; वेद—जानता है; सः—वह; वेद-वित्—वेदों का ज्ञाता।

श्रीभगवान् ने कहा : एक वटवृक्ष है, जिसका मूल ऊपर की ओर और शाखाएँ नीचे की ओर हैं, तथा जिसके पत्ते वैदिक स्तोत्र हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वेदों का ज्ञाता है।

भक्तियोग के महत्त्व की विवेचना के पश्चात् कोई यह प्रश्न उठा सकता है, “तब वेदों का क्या?” इस अध्याय में यह समझाया गया है कि वैदिक अध्ययन का प्रयोजन श्रीकृष्ण को समझना है। अतः जो कृष्णभावनामृत में स्थित है, जो भक्ति में संलग्न है, वह वेदों को पहले से ही जान चुका है।

इस भौतिक जगत् के बन्धन की तुलना यहाँ एक वटवृक्ष से की गई है। जो सकाम कर्म में संलग्न रहता है, उसके लिए इस वटवृक्ष का कोई अन्त नहीं। वह एक शाखा से दूसरी, दूसरी से तीसरी, तीसरी से चौथी पर भटकता रहता है। इस भौतिक जगत् रूपी वृक्ष का कोई अन्त नहीं, और जो इस वृक्ष से आसक्त है, उसके लिए मुक्ति की कोई सम्भावना नहीं। आत्मोन्नति के निमित्त बने वैदिक स्तोत्र इस वृक्ष के पत्ते कहे जाते हैं। इस वृक्ष के मूल ऊपर की ओर बढ़ते हैं, क्योंकि वे वहाँ से आरम्भ होते हैं जहाँ ब्रह्मा स्थित हैं—इस ब्रह्माण्ड का सर्वोच्च लोक। यदि कोई मोह के इस अविनाशी वृक्ष को समझ ले, तो वह इससे बाहर निकल सकता है।

इस निष्क्रमण की प्रक्रिया को समझना चाहिए। पूर्ववर्ती अध्यायों में यह समझाया जा चुका है कि भौतिक बन्धन से बाहर निकलने की अनेक विधियाँ हैं। और तेरहवें अध्याय तक हमने देखा कि परमेश्वर की भक्ति ही सर्वोत्तम मार्ग है। अब, भक्ति का मूल सिद्धान्त भौतिक कर्मों से अनासक्ति तथा भगवान् की दिव्य सेवा में आसक्ति है। भौतिक जगत् के प्रति आसक्ति को तोड़ने की प्रक्रिया इस अध्याय के आरम्भ में विवेचित है। इस भौतिक अस्तित्व का मूल ऊपर की ओर बढ़ता है। इसका अर्थ है कि यह समस्त भौतिक तत्त्व से, ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च लोक से आरम्भ होता है। वहाँ से समूचा ब्रह्माण्ड विस्तृत होता है, जिसमें अनेक शाखाएँ हैं, जो विविध लोक-व्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। फल जीवों के कर्मों के परिणामों का प्रतिनिधित्व करते हैं, अर्थात् धर्म, अर्थ, इन्द्रियतृप्ति तथा मोक्ष का।

अब, इस संसार में ऐसे वृक्ष का कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता जिसकी शाखाएँ नीचे और मूल ऊपर की ओर हों, किन्तु ऐसी वस्तु विद्यमान है। वह वृक्ष किसी जलाशय के निकट देखा जा सकता है। हम देख सकते हैं कि तट पर खड़े वृक्ष जल में अपनी शाखाओं को नीचे और मूल को ऊपर की ओर प्रतिबिम्बित करते हैं। दूसरे शब्दों में, इस भौतिक जगत् रूपी वृक्ष आध्यात्मिक जगत् के वास्तविक वृक्ष का मात्र प्रतिबिम्ब है। आध्यात्मिक जगत् का यह प्रतिबिम्ब इच्छा पर स्थित है, ठीक जैसे वृक्ष का प्रतिबिम्ब जल पर स्थित होता है। इच्छा ही इस प्रतिबिम्बित भौतिक प्रकाश में वस्तुओं के स्थित होने का कारण है। जो इस भौतिक अस्तित्व से बाहर निकलना चाहता है, उसे विश्लेषणात्मक अध्ययन द्वारा इस वृक्ष को भली-भाँति जान लेना चाहिए। तभी वह इससे अपना सम्बन्ध काट सकता है।

यह वृक्ष, वास्तविक वृक्ष का प्रतिबिम्ब होने के कारण, उसकी ठीक प्रतिकृति है। आध्यात्मिक जगत् में सब कुछ विद्यमान है। निर्विशेषवादी ब्रह्मा को इस भौतिक वृक्ष का मूल मानते हैं, और सांख्य दर्शन के अनुसार उस मूल से प्रकृति, पुरुष, फिर तीन गुण, फिर पाँच स्थूल तत्त्व (पञ्च-महाभूत), फिर दस इन्द्रियाँ (दशेन्द्रिय), मन आदि उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार वे समूचे भौतिक जगत् का विभाजन करते हैं। यदि ब्रह्मा समस्त प्रकटीकरणों के केन्द्र हैं, तो यह भौतिक जगत् उस केन्द्र का 180 अंशों तक प्रकटीकरण है, और शेष 180 अंश आध्यात्मिक जगत् का निर्माण करते हैं। भौतिक जगत् विकृत प्रतिबिम्ब है, अतः आध्यात्मिक जगत् में वही विविधता होनी चाहिए, किन्तु यथार्थ रूप में। प्रकृति परमेश्वर की बहिरंगा शक्ति है, और पुरुष स्वयं परमेश्वर हैं, और यह भगवद्गीता में समझाया गया है। चूँकि यह प्रकटीकरण भौतिक है, अतः यह क्षणिक है। प्रतिबिम्ब क्षणिक होता है, क्योंकि वह कभी दिखता है और कभी नहीं दिखता। किन्तु जिससे प्रतिबिम्ब प्रतिबिम्बित होता है, वह उद्गम नित्य है। वास्तविक वृक्ष के इस भौतिक प्रतिबिम्ब को काट देना होता है। जब यह कहा जाता है कि कोई व्यक्ति वेदों को जानता है, तो यह मान लिया जाता है कि वह जानता है कि इस भौतिक जगत् के प्रति आसक्ति को कैसे काटा जाए। यदि कोई उस प्रक्रिया को जानता है, तो वह वस्तुतः वेदों को जानता है। जो वेदों के कर्मकाण्डीय सूत्रों से आकृष्ट होता है, वह वृक्ष के सुन्दर हरे पत्तों से आकृष्ट होता है। वह वेदों के प्रयोजन को ठीक से नहीं जानता। वेदों का प्रयोजन, जैसा कि स्वयं भगवान् ने प्रकट किया है, इस प्रतिबिम्बित वृक्ष को काट डालना तथा आध्यात्मिक जगत् के वास्तविक वृक्ष को प्राप्त करना है।