अध्याय 15 · 9 / 19
15.10
उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
उत्क्रामन्तम्—शरीर छोड़ते हुए; स्थितम्—शरीर में स्थित; वापि—अथवा; भुञ्जानम्—भोगते हुए; वा—अथवा; गुण-अन्वितम्—भौतिक प्रकृति के गुणों के वश में; विमूढाः—मूर्ख व्यक्ति; न—कभी नहीं; अनुपश्यन्ति—देख सकते हैं; पश्यन्ति—देख सकते हैं; ज्ञान-चक्षुषः—जिसके पास ज्ञान के नेत्र हैं।
मूर्ख यह नहीं समझ सकते कि जीव अपने शरीर को किस प्रकार छोड़ता है, और न ही वे यह समझ सकते हैं कि वह प्रकृति के गुणों के वश में किस प्रकार के शरीर का भोग करता है। किन्तु जिसके नेत्र ज्ञान में प्रशिक्षित हैं, वह यह सब देख सकता है।
ज्ञान-चक्षुषः शब्द अत्यन्त सार्थक है। ज्ञान के बिना मनुष्य यह नहीं समझ सकता कि जीव अपने वर्तमान शरीर को किस प्रकार छोड़ता है, न ही यह कि वह अगले जीवन में किस रूप का शरीर ग्रहण करने जा रहा है, और न ही यह कि वह किसी विशेष प्रकार के शरीर में क्यों रह रहा है। इसके लिए भगवद्गीता तथा प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से सुने गए समान साहित्य से प्राप्त बहुत अधिक ज्ञान आवश्यक है। जो इन सब वस्तुओं को अनुभव करने में प्रशिक्षित है, वह सौभाग्यशाली है। प्रत्येक जीव कुछ विशेष परिस्थितियों के अधीन अपना शरीर छोड़ रहा है; वह कुछ विशेष परिस्थितियों के अधीन जीवित है और भौतिक प्रकृति के वश में कुछ विशेष परिस्थितियों के अधीन भोग कर रहा है। फलस्वरूप वह विषय-भोग के मोह में विभिन्न प्रकार के सुख तथा दुःख भोगता है। जो व्यक्ति काम तथा इच्छा से सदा मूर्ख बने रहते हैं, वे अपने शरीर के परिवर्तन तथा किसी विशेष शरीर में अपने निवास को समझने की समस्त शक्ति खो देते हैं। वे इसे समझ नहीं सकते। किन्तु जिन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान का विकास किया है, वे देख सकते हैं कि आत्मा शरीर से भिन्न है और अपना शरीर बदल रही है तथा विभिन्न प्रकार से भोग कर रही है। ऐसे ज्ञान में स्थित व्यक्ति समझ सकता है कि बद्धजीव इस भौतिक अस्तित्व में किस प्रकार दुःख भोग रहा है। अतः जो कृष्णभावनामृत में अत्यधिक उन्नत हैं, वे साधारण जनों को यह ज्ञान देने का भरसक प्रयत्न करते हैं, क्योंकि उनका बद्ध जीवन अत्यन्त क्लेशकर है। उन्हें इससे बाहर निकलना चाहिए, कृष्णभावनाभावित होना चाहिए और आध्यात्मिक जगत् को स्थानान्तरित होने के लिए स्वयं को मुक्त करना चाहिए।