हि

अध्याय 15 · 10 / 19

15.11

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥

यतन्तः—प्रयत्न करते हुए; योगिनः—योगीगण; च—भी; एनम्—इसको; पश्यन्ति—देख सकते हैं; आत्मनि—आत्मा में; अवस्थितम्—स्थित; यतन्तः—यद्यपि प्रयत्न करते हुए; अपि—यद्यपि; अकृत-आत्मानः—आत्म-साक्षात्कार के बिना; न—नहीं; एनम्—इसको; पश्यन्ति—देख सकते हैं; अचेतसः—अविकसित मन।

प्रयत्नशील योगी, जो आत्म-साक्षात्कार में स्थित है, इस सबको स्पष्ट रूप से देख सकता है। किन्तु जो आत्म-साक्षात्कार में स्थित नहीं हैं, वे यह नहीं देख सकते कि क्या घटित हो रहा है, भले ही वे प्रयत्न करें।

आध्यात्मिक आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर अनेक योगी हैं, किन्तु जो आत्म-साक्षात्कार में स्थित नहीं है, वह यह नहीं देख सकता कि जीव के शरीर में वस्तुएँ किस प्रकार बदल रही हैं। इस सन्दर्भ में योगिनः शब्द सार्थक है। आजकल अनेक तथाकथित योगी हैं, और योगियों के अनेक तथाकथित संघ हैं, किन्तु वे आत्म-साक्षात्कार के विषय में वस्तुतः अन्धे हैं। वे केवल किसी प्रकार के व्यायाम के व्यसनी हैं और इसी से सन्तुष्ट हैं कि शरीर सुगठित तथा स्वस्थ है। उनके पास और कोई जानकारी नहीं। वे यतन्तोऽप्यकृतात्मानः कहलाते हैं। यद्यपि वे किसी तथाकथित योग-पद्धति में प्रयत्न कर रहे हैं, तथापि वे आत्म-साक्षात्कारी नहीं हैं। ऐसे लोग आत्मा के देहान्तरण की प्रक्रिया को नहीं समझ सकते। केवल वे ही समझ सकते हैं कि वस्तुएँ किस प्रकार घटित हो रही हैं, जो वास्तव में योग-पद्धति में स्थित हैं और जिन्होंने आत्मा, जगत् तथा परमेश्वर का साक्षात्कार किया है—दूसरे शब्दों में, भक्तियोगी, अर्थात् वे जो कृष्णभावनामृत में विशुद्ध भक्ति में संलग्न हैं।