अध्याय 15 · 8 / 19
15.9
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥
श्रोत्रम्—कान; चक्षुः—आँखें; स्पर्शनम्—स्पर्श; च—भी; रसनम्—जिह्वा; घ्राणम्—सूँघने की शक्ति; एव—भी; च—और; अधिष्ठाय—स्थित होकर; मनः—मन; च—भी; अयम्—यह; विषयान्—विषयों को; उपसेवते—भोगता है।
इस प्रकार जीव दूसरा स्थूल शरीर ग्रहण करके एक विशेष प्रकार के कान, जिह्वा, नाक तथा स्पर्शेन्द्रिय प्राप्त करता है, जो मन के चारों ओर समूहबद्ध हैं। इस प्रकार वह विषयों के एक विशेष समूह का भोग करता है।
दूसरे शब्दों में, यदि जीव अपनी चेतना को बिल्लियों तथा कुत्तों के गुणों से मिश्रित कर लेता है, तो वह अपने अगले जीवन में बिल्ली अथवा कुत्ते का शरीर प्राप्त करके भोग करता है। चेतना मूल रूप से जल के समान शुद्ध होती है। किन्तु यदि हम जल को किसी रंग से मिला दें, तो वह बदल जाता है। इसी प्रकार चेतना शुद्ध है, क्योंकि आत्मा शुद्ध है। किन्तु चेतना भौतिक गुणों की संगति के अनुसार बदल जाती है। वास्तविक चेतना कृष्णभावनामृत है। अतः जब मनुष्य कृष्णभावनामृत में स्थित होता है, तब वह अपने शुद्ध जीवन में होता है। किन्तु यदि उसकी चेतना किसी प्रकार की भौतिक मानसिकता से मिश्रित हो जाती है, तो अगले जीवन में वह तदनुरूप शरीर प्राप्त करता है। आवश्यक नहीं कि वह पुनः मनुष्य शरीर ही प्राप्त करे; वह बिल्ली, कुत्ते, सूअर, देवता अथवा अनेक अन्य रूपों में से किसी एक का शरीर प्राप्त कर सकता है, क्योंकि चौरासी लाख योनियाँ हैं।