अध्याय 15 · 11 / 19
15.12
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥
यत्—जो; आदित्य-गतम्—सूर्य के प्रकाश में; तेजः—तेज; जगत्—समूचा संसार; भासयते—प्रकाशित करता है; अखिलम्—पूर्णतः; यत्—जो; चन्द्रमसि—चन्द्रमा में; यत्—जो; च—भी; अग्नौ—अग्नि में; तत्—वह; तेजः—तेज; विद्धि—समझो; मामकम्—मुझसे।
सूर्य का तेज, जो इस समूचे संसार के अन्धकार को दूर करता है, मुझसे आता है। और चन्द्रमा का तेज तथा अग्नि का तेज भी मुझसे ही आता है।
अल्पबुद्धि व्यक्ति यह नहीं समझ सकते कि वस्तुएँ किस प्रकार घटित हो रही हैं। भगवान् यहाँ जो समझा रहे हैं, उसे समझकर ज्ञान का आरम्भ किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि तथा विद्युत को देखता है। मनुष्य को केवल यह समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि सूर्य का तेज, चन्द्रमा का तेज तथा विद्युत अथवा अग्नि का तेज पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से आ रहा है। जीवन की ऐसी धारणा में, अर्थात् कृष्णभावनामृत के आरम्भ में, इस भौतिक जगत् के बद्धजीव के लिए बहुत अधिक उन्नति निहित है। जीव अनिवार्यतः परमेश्वर के खण्डांश हैं, और वे यहाँ यह संकेत दे रहे हैं कि वे किस प्रकार भगवद्धाम को, अपने घर लौट सकते हैं। इस श्लोक से हम समझ सकते हैं कि सूर्य समूचे सौरमण्डल को प्रकाशित कर रहा है। विभिन्न ब्रह्माण्ड तथा सौरमण्डल हैं, और विभिन्न सूर्य, चन्द्रमा तथा लोक भी हैं। सूर्य का प्रकाश परमेश्वर के आध्यात्मिक आकाश में विद्यमान आध्यात्मिक तेज के कारण है। सूर्य के उदय के साथ मनुष्यों के कर्म आरम्भ हो जाते हैं। वे अपना भोजन तैयार करने के लिए अग्नि प्रज्वलित करते हैं; वे कारखाने आरम्भ करने के लिए अग्नि प्रज्वलित करते हैं, आदि। अग्नि की सहायता से अनेक कार्य किए जाते हैं। अतः सूर्योदय, अग्नि तथा चन्द्रमा का प्रकाश जीवों के लिए इतने आनन्ददायक हैं। उनकी सहायता के बिना कोई जीव जीवित नहीं रह सकता। अतः यदि कोई यह समझ ले कि सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि का प्रकाश तथा तेज पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण से उद्भूत हो रहा है, तो उसका कृष्णभावनामृत आरम्भ हो जाएगा। चन्द्रमा के प्रकाश से समस्त वनस्पतियाँ पोषित होती हैं। चन्द्रमा का प्रकाश इतना आनन्ददायक है कि लोग सरलता से समझ सकते हैं कि वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से जीवित हैं। उनकी कृपा के बिना न तो सूर्य हो सकता है, न चन्द्रमा हो सकता है, और न अग्नि हो सकती है, और सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि की सहायता के बिना कोई जीवित नहीं रह सकता। ये कुछ विचार हैं जो बद्धजीव में कृष्णभावनामृत को जागृत करने के लिए हैं।