अध्याय 15 · 17 / 19
15.18
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥
yasmāt—क्योंकि; kṣaram—पतनशील से; atītaḥ—दिव्य; aham—मैं; akṣarāt—अपतनशील से; api—उससे भी श्रेष्ठ; ca—और; uttamaḥ—सर्वोत्तम; ataḥ—अतः; asmi—मैं हूँ; loke—संसार में; vede—वैदिक साहित्य में; ca—और; prathitaḥ—विख्यात; puruṣottamaḥ—परम पुरुष के रूप में।
क्योंकि मैं दिव्य हूँ, पतनशील तथा अपतनशील दोनों से परे हूँ, और क्योंकि मैं सर्वोत्तम हूँ, इसलिए मैं संसार तथा वेदों दोनों में उस परम पुरुष के रूप में विख्यात हूँ।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को कोई भी पार नहीं कर सकता—न बद्धजीव, न मुक्त आत्मा। अतः वे समस्त पुरुषों में सर्वोत्तम हैं। यहाँ अब यह स्पष्ट है कि जीव तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् पृथक्-पृथक् व्यक्ति हैं। भेद यह है कि जीव, चाहे बद्ध अवस्था में हों या मुक्त अवस्था में, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की अचिन्त्य शक्तियों को मात्रा में पार नहीं कर सकते।