अध्याय 15 · 18 / 19
15.19
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९ ॥
yaḥ—जो कोई; mām—मुझको; evam—निश्चय ही; asammūḍhaḥ—सन्देहरहित होकर; jānāti—जानता है; puruṣottamam—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को; saḥ—वह; sarva-vit—सर्वज्ञ; bhajati—भक्ति करता है; mām—मेरी; sarva-bhāvena—सब प्रकार से; bhārata—हे भरतपुत्र।
जो कोई मुझे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में सन्देहरहित होकर जानता है, उसे सर्वज्ञ समझना चाहिए, और इसलिए वह सब प्रकार से मेरी पूर्ण भक्ति में संलग्न होता है, हे भरतपुत्र।
जीवों तथा परम परब्रह्म की स्वरूपगत स्थिति के विषय में अनेक दार्शनिक कल्पनाएँ प्रचलित हैं। अब इस श्लोक में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् स्पष्ट रूप से समझाते हैं कि जो कोई भगवान् श्रीकृष्ण को परम पुरुष रूप में जानता है, वही वस्तुतः सर्वज्ञ है। अपूर्ण ज्ञानी केवल परम सत्य के विषय में कल्पना करता रहता है, किन्तु पूर्ण ज्ञानी अपने अमूल्य समय को व्यर्थ किए बिना सीधे कृष्णभावनामृत में, परमेश्वर की भक्ति में, संलग्न हो जाता है। सम्पूर्ण भगवद्गीता में पग-पग पर इसी तथ्य पर बल दिया गया है। और तब भी भगवद्गीता के ऐसे अनेक हठी टीकाकार हैं, जो परम परब्रह्म तथा जीवों को एक ही मानते हैं।
वैदिक ज्ञान श्रुति कहलाता है, अर्थात् श्रवण द्वारा प्राप्त ज्ञान। मनुष्य को वस्तुतः वैदिक सन्देश श्रीकृष्ण तथा उनके प्रतिनिधियों जैसे अधिकारियों से ही ग्रहण करना चाहिए। यहाँ श्रीकृष्ण प्रत्येक वस्तु का भली-भाँति विवेचन करते हैं, और मनुष्य को इसी स्रोत से सुनना चाहिए। केवल सूअरों की भाँति सुन लेना पर्याप्त नहीं है; मनुष्य को अधिकारियों से समझ पाने में समर्थ होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि मनुष्य केवल शैक्षिक रूप से कल्पना करता रहे। मनुष्य को विनम्रतापूर्वक भगवद्गीता से यह सुनना चाहिए कि ये जीव सदैव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अधीन हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के अनुसार, जो कोई इसे समझ पाने में समर्थ है, वही वेदों के प्रयोजन को जानता है; अन्य कोई वेदों के प्रयोजन को नहीं जानता।
bhajate शब्द अत्यन्त सार्थक है। अनेक स्थानों पर bhajate शब्द परमेश्वर की सेवा के सम्बन्ध में व्यक्त हुआ है। यदि कोई व्यक्ति पूर्ण कृष्णभावनामृत में भगवान् की भक्ति में संलग्न है, तो समझना चाहिए कि उसने समस्त वैदिक ज्ञान को समझ लिया है। वैष्णव परम्परा में कहा गया है कि यदि कोई श्रीकृष्ण की भक्ति में संलग्न है, तो परम परब्रह्म को समझने के लिए किसी आध्यात्मिक प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं रहती। वह पहले से ही उस पद पर पहुँच चुका है, क्योंकि वह भगवान् की भक्ति में संलग्न है। उसने समझ की समस्त प्रारम्भिक प्रक्रियाओं को पूर्ण कर लिया है; इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति लाखों जन्मों तक कल्पना करने के पश्चात् भी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और मनुष्य को वहीं शरणागत होना है, तो इतने वर्षों तथा जन्मों की उसकी समस्त कल्पना समय का व्यर्थ अपव्यय है।